भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 219

५२ ८ अ० २ पा० १ ख० । श्लेष्मा या चर्बी से चुपड़े हुए होते हैं। यहां चर्म तथा श्लेष्माके अतिरिक्त अन्य किसी अर्थका संभव नहीं है। जैसे कि,— २ “गोभिः सन्नद्धा पतति प्रसूता” [ ऋ० सं०, ५, १, २१, १ ] यह बाणकी स्तुति है। 'इषु' भी स्नाव (नाड़ी) से वेष्टित और श्लेष्मासे चुपड़ा हुआ होता है। 'ज्या' को भी 'गो' शब्दसे बोलते हैं। यदि वह गोसे ही बनी हुई हो तो वहां 'गो' शब्दको ताद्धित या गौण समझना। जो नाम जिस वस्तुका होता है, वह नाम जब उस वस्तुके किसी अवयव या उसके सम्बन्धी, किसी अन्य, वस्तुको कहे, तो उसे गौण समझना उसीको ताद्धित कहते हैं। जो शब्द, जिस अर्थमें प्रसिद्ध हो, उस अर्थमें उसकी मुख्यावृत्ति समझना, और उस शब्दको वहां मुख्य या अभिधायक जानना। यदि शब्द उस मुख्य अर्थके सम्बन्धसे ही, किसी अन्य अर्थमें चला जाय तो, वहां, उस शब्दको गौण, और उसकी वृत्तिको गौणी समझना। इसी रीतिसे गो, शब्द, गौ अर्थमें मुख्य है, और गोके चर्म, स्नाव तथा श्लेष्मा आदि अर्थमें गौण है। ऐसे ही अन्यत्र अन्यत्र भी ध्यान रखना चाहिये। यह शब्दका स्वभाव ही है, कि,—वह जिस अर्थमें प्रसिद्ध होता है, अविकृत होकर भी उससे हट कर उसके किसी भागमें चला जाता है। शब्दोंके व्याख्यानमे यह बात प्रायः देखी जाती है, इससे ऐसे स्थलोंमें आश्चर्य नहीं मानना। २—सुपर्णं वस्ते मृगो अस्या दन्तो गोभिः सन्नद्धा पतति प्रसूता । यत्रानरः संच विच द्रवन्ति तत्रास्मभ्यः मिषवः शर्म यंसन् ॥ [ ऋ० सं०-५, १, २१, १ । य० वा० सं०-२६, ४७ । ]