निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । ५३ [ ख ] यदि वह ज्या गोसे बनी हुई न हो तो, वहां 'गो' शब्दकी “गमयति इषून्—इति गौः” 'बाणोंको फेंकनेवाली'— ऐसी व्युत्पत्ति करके अन्य द्रव्य ही लेना। इस व्युत्पत्तिमें 'गो' शब्द स्वतन्त्रतासे ज्या अर्थमें आता है, किन्तु किसो अन्य अर्थके द्वारा नहीं, इससे मुख्य है, गौण नहीं। जैसे, कि पूर्व, अर्थमें था ॥ १ ॥ [ खं० २ ] * “वृक्षे वृक्षे नियतामोमयीत् स्ततो वयः प्रपतान् पूरुषादः ।” [ ऋ० सं०-७, ७, १६, २, ] [ भाष्यम् ] वृक्षे वृक्षे धनुषि धनुषि । 'वृक्षः' व्रश्चनात् । नियताऽमोमयीद् गौः। शब्दं करोति । मीमयतिः शब्दकर्मा । ततो वयः प्रपतन्ति, पुरुषानदनाय । 'विः' इति शकुनिनाम । वेतेर्गति- कर्मणः । अथापि-इषु नाम-इह भवति एतस्माद्-एव । आदित्योऽपि 'गौः' उच्यते । [ यथा ] “उतादः परुषे गवि” [ ऋ० सं०-४, ८, २२, ३ ] [ भाष्यम् ] पर्ववति भास्वति,-इति औपमन्यवः ।
- “अमीमयद् गौः” यहां वेद भगवान्ने एक उत्तम साहित्य भी दिखाया है, वह यह कि—धनुषकी ताँतको गो बनाया, वह उधर उसके शब्दको मिमाना कहा है।