निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । ५५ [ निरुक्तार्थ ] 'पर्ववाले [ या ] प्रकाश वालेमें'-यह उपमन्यु के पुत्र मानते हैं । और भी-इस [ सूर्य ] का किरण चन्द्रमा में प्रकाशित होता है, इसके साथ यह भी जानना चाहिये, कि-इस [ चन्द्रमा-] की दीप्ति या ज्योति आदित्य से होती है। [ प्रमाण- ] “सुषुम्णः सूर्यरश्मिश्चन्द्रमा गन्धर्वः ।” [ य० वा० सं०-१८, ४०] [ मन्त्रार्थ-] सुषुम्ण-नामक सूर्यका किरण [ ही ] चन्द्रमा गन्धर्व है। यह निगम या जानने वाला भी है। [ प्रयोजन-] वह भी 'गो' कहा जाता है। [ जैसे-] "अत्राह गोर- मन्वत" । इसका व्याख्यान आगे करेंगे । सब रश्मि या किरणें भी 'गो' कहे जाते हैं ॥२॥ [ जैसे-] व्याख्या । उदाहरण-“वृक्षे॑ वृक्षे॒ निय॑ता मीमयद्गौ स्ततो॑ वयः॒ प्रप॑तान् पूरु॒षादः॑ । ऋ॒थे॒दं विश्वं॒ भुव॑नं भया॒त इन्द्रा॑य सुन्वद्दृष॒ये च॑ शिक्षत् । [ ऋ० सं०,—७, ७, १६ २ ] वसुक इन्द्रका पुत्र ऋषि। त्रिष्टुप्छन्दः। इन्द्र देवता। मरुत्व- तीय महाव्रत में, शस्त्र । भगवान् इन्द्र संग्रामोंमें अनेकबाहु होकर अनेक धनुष धारण करते हैं। उनको देखकर ऋषि इस प्रकार कहता है—'इन्द्र ने जितने धनुष धारण किये हैं, उनमें प्रत्येकमें नियत या बँधी हुई 'गौः' अर्थात् प्रत्यञ्चा [ तांत ] जो गो-से बनी है, अथवा बाणोंको चलाने वाली है, इन्द्रके भुजसे खिची हुई होकर शब्द करती है। “ततः”