निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६ २ अ० २ पा० २ ख० । [ क- ] शब्द होनेके अनन्तर ही, 'वयः" [ क-] पक्षी संग्राम भूमि- में इन्द्रके बाणोंसे तत्काल ही गिरे हुए शत्रुओके मृत शरीरोंको भक्षण करनेके लिये गिरते हैं । "ततः" [ ख- ] अथवा उसी धनुष- से पक्षियोंके पत्र या पांख के लगे रहनेसे इषु [ बाण ] भी "वयः" पक्षी हैं, वे शत्रुओंके प्राण-भक्षण करनेके लिये गिरते हैं, अथवा "वयः" [ ग ] वी-गतौ ( अदा० प० ) धातुसे 'वि' शब्द बनता है, गति क्रियाके योगसे बाण भी 'वि' शब्दके वाच्य हैं, पहिले व्या- ख्यानमें बाण अर्थमें 'वि' शब्द गौण है, और दूसरेमे मुख्य है। 'ऐसा अति प्रभाववाला इन्द्र है'-यह जान कर सम्पूर्ण विश्व या प्राणि-मात्र यत्-किञ्चित् त्रुटिके लिये भी अपने अपने कर्ममें डरता है, तथा डर कर इन्द्रके लिये सोमका सवनरूप सस्कार करता हुआ ऋत्विज्को दक्षिणा देता है । भाव यह है कि-सब जगत् इन्द्रकी ओर मुख उठाये हुए और सब कार्यको छोड़ कर आदर सहित स्थित है, जो इन्द्र ऐसे प्रभाववाला है. उसको हम अपने वाञ्छित- की सिद्धिके लिये स्तुति करते हैं । १ निगम-प्रसक्त "वृक्ष" शब्दको व्याख्या करते हैं—"वृक्षो व्रश्च- नात्" इसी लिये वृक्षोंको वृक्ष कहते हैं, कि,-वह इन्धनके लिये काटा जाता है । और शब्द मन्त्रके व्याख्यानमें ही आ चुके हैं, इससे उनका निर्वचन नहीं किया जाता । इन पूर्वोक्त उदाहरणोंसे यह दिखाया गया कि, 'अवयवमें अवयवीके समान शब्दका प्रयोग होता है। इसके अनन्तर यह दिखाते हैं कि—'अन्य बहुतसे अर्थान्तरोंमें भी १—जो मन्त्र किसो शब्दके अर्थके साक्ष्यमें दिया जाता है, वह 'निगम' कहाता है, और उसमें आये हुए अन्य व्याख्येय शब्दको 'निगम-प्रसक्त' कहते हैं।