भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 224

हिन्दी निरुक्त । ५७

'गो' शब्द आता है, जिनमें गोका सम्बंध बिलकुल ही नहीं है। यह विषय ऐकपदिक या नैगम काण्डमें कहने योग्य है, किन्तु यहाँ 'गो' शब्दके प्रसङ्गसे कहा जाता है,— [१] “आदित्योऽपि गौरुच्यते” आदित्यका नाम भी 'गो' है। जैसे— “उतादः परुषे गवि सूरश्चक्रं हिरण्ययम् । न्यैर- यद्रथी तमः ॥ [ऋ० सं०, ४, ८, २२, ३] भारद्वाज ऋषि । गायत्री छन्दः । पूषा देवता । नैरुक्तोंके मतमें पूषा नाम आदित्यका है, और अन्य मतमें भूमिकी । धारा विशेष या, प्रकाश अथवा अहोरात्रादि रूप पर्ववाले तथा निरन्तर गमन करनेवाले उस आदित्य-मण्डलमें स्थित होकर, रथीतम [जिसका रथ मुहूर्त्तमात्र भी विश्राम नहीं करता] सूर्यदेव तेजोमय मण्डलको, उदय, अस्तमय तथा मध्यान्हकालके विभाग करनेके लिये नियत मार्गसे नित्य ही घुमाता है। अथवा उस मण्डलमें अवस्थित जो आदित्यान्तरवर्ती सूर्य- भगवान्, वह—लव, क्षण, निमेष, त्रुटि, मुहूर्त्त, अहोरात्र, पक्ष, मास, ऋतु, अयन तथा संवत्सर रूप कालचक्रको प्रेरित करता है। वह ऐसे गुणोंवाला है, इससे हम उसकी अपने वाञ्छित अर्थकी सिद्धिके लिये स्तुति करते हैं। [२] सूर्य भगवान्‌का 'सुषुम्ण' नामक एक रश्मि या किरण होता है, वहो चन्द्रमण्डलमें जाकर लगता है, उसोसे चन्द्रमा दीप्तिमान् होता है, और अपनी ज्योत्स्नासे सब दिशाओंको प्रकाशित करता है। इससे यह बात समझने योग्य है कि—“आदित्य देवसे ही चन्द्रमामें प्रकाश आता है।” इस अर्थको निगम भी प्रमाणित करता है।