भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 225, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 225

५८ २ अ० २ पा० ३ खं० । “सुषुम्णः सूर्यरश्मिश्चन्द्रमा गन्धर्वः” [ य० वा० सं०-१८, ४० ] ‘सुषुम्ण’ नामक सूर्यका रश्मि चन्द्रमामें जाकर स्वयम् चन्द्रमा हो जाता है, तथा वही गन्धर्व होता है। जिस सुषुम्ण नामक सूर्यकी रश्मिका ऊपर परिचय दिया गया है, वही एक रश्मि ‘गो’ शब्दका वाच्य होता है। जिस प्रकार यह ‘रश्मि’ ‘गो’ नामसे बोला जाता है, वैसा ही यह उदाहरण है,— “अत्राह गो रमन्वत” उस आदित्यमण्डलमें ‘गो’ नाम सुषुम्ण नामक एक सूर्य रश्मिके अवस्थानको अन्य सूर्यके रश्मियोंने स्वीकार किया है। इस मन्त्रकी विशेष व्याख्या नैगम काण्ड [ ४, ४, ४ ] में होगी । [ ३ ] सब रश्मि भी ‘गो’ कहलाते हैं। इसके अनुसार यह ऋचा उदाहरण है ॥ २ ॥ [ खं० ३ ] “ता वां वास्तून्युश्मसि गमध्यै यत्र गावो भूरि शृङ्गा अयासः । अत्राह तदुरु गायस्य वृष्णः परमं पद मवभाति भूरि ॥” [ ऋ० सं०-२, २, २४, ६ ] [ भा० ] तानिवां वास्तूनि कामयामहे, गमनाय, यत्र गावो बहु शृङ्गाः । ‘भूरि,-इति बहुनो नाम धेयम्, प्रभवति,-इतिसतः । ‘शृङ्ग’ श्रयते र्वा । शृणाते र्वा । शम्नाते र्वा । शरणाय उद्गतम्, इति वा । शिरसो निर्गतम्,-इति वा ‘अयासः’-अयनाः । तत्र तद्उरुगायस्य

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य) · पृष्ठ 225, कुल 1282 में से · BharatKosha