निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । ६३ भवति । आविष्टो रसान् । आविष्टो भासं ज्योतिशाम् । आविष्टो भासा-इति वा । अथ द्यौः-आविष्टा ज्योतिर्भिः पुण्यकृद्भिञ्च । 'नभः' आदित्यो भवति । नेता भासाम् । ज्योतिषां प्रणयः । अपि वा भन एव स्याद्विपरीतः । न'न भाति-इति वा । एतेन द्यौ व्याख्याता ॥ २ ॥ इति द्वितीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥ २, ४ ॥ अर्थ । [ दोनों पक्षोंमें छहों शब्दोंका निर्वचन । ] (आदित्य पक्षमें-) 'खर्' (१) आदित्य होता है । (क्योंकि-) सुन्दर गमन करता है । ( ऋ' गतौ (जु० प०) धातुसे । ) सुन्दर प्रेरण करनेवाला है । [ अर्थात् उसके उदय होते ही सब लोक अपने कर्ममें लगजाता है । ] [ 'ईर्'गतौ (अदा० आ०) धातुसे । ] सुन्दर रसोंके प्रति गया हुआ । [ सूर्यकी किरणें पृथ्वी पर सब जलको खे'चनेके लिये आती हैं । ] सब ज्योतियोंके प्रकाशके प्रति गया हुआ । [ क्योंकि सूर्यकी ज्योतिसे ही चन्द्र आदि ज्योति चमकते हैं । ] अथवा भास् या प्रकाशसे घिरा हुआ । [ द्युलोक- पक्षमें । ] इससे द्यौ भी व्याख्याकी गई । [ आदित्यवाली बातें आदित्य-लोकमे भी हैं, इससे वे ही अर्थ इस पक्षमें ले लेने चाहियें । ] आदित्य पक्षमें-] 'पृश्नि' ( २ ) आदित्य है। [ क्योंकि-] नैरूक्त कहते हैं कि—'इसे वर्ण बाहुल्यसे व्याप्त करता है। रसोंको अच्छे प्रकार स्पर्श करता है। ज्योतियोकी भास् को अच्छे प्रकार स्पर्श करने या छूनेवाला । अथवा भास् या