निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदीप्तिसे छूया हुआ। [द्युलोक पक्षमें-] और द्यौ (द्युलोक) ज्योतियों या ग्रह-ताराओसे और पुण्यवान् पुरुषोंसे छूई हुई। [आदित्य पक्षमें-] 'नाक' (३) आदित्य है। [क्योंकि-] वह भासों या प्रकाशो का नेता है। और ज्योतिश्चक्र या ग्रहमण्डलका घुमानेवाला। [इन्ही भगवान् सूर्यदेवके रश्मिजालके अग्रोंमें लगा हुआ ज्योतिश्चक्र घुमता है।] [द्युलोक पक्षमे-] और 'द्यौः' [नाक क्यो है?] 'क' यह सुखका नाम है। उसका प्रतिषेध करके प्रतिषेध किया जावेगा। [अर्थात् जो 'क' सुख नहीं है, वह 'अक' दुःख होता है, और 'अक' या दुःख जिसमें न हो, वह नाक होता है। द्युलोकमें दुःख न होनेसे वह 'नाक' है। 'न, अ, क'—इन तीन शब्दोके जुडनेसे 'नाक' शब्द होता है।] [इस अर्थमें ब्राह्मण प्रमाण है-] “न वा ० ०”। उस लोकमें गये हुए को कोई असुख या दुःख नहीं होता। क्योकि वहाँ पुण्यकर्मके करनेवाले ही जाते हैं। [आदित्य पक्षमें-] 'गो' (४) आदित्य होता है। [क्यों?-] रसोको अपनी ओर ले जाता है, या उन्हें पृथवीसे सुखा देता है। [अथवा-] अन्तरिक्षमें चलता है। और द्यौ [क्यों 'गो' है?] जिससे कि—वह पृथवीके ऊपर दूर गई हुई होती है। और जिससे कि—इसमें ज्योतिष्गण गमन करते हैं। [आदित्य पक्षमें-] विष्टप्' (५) आदित्य होता है। [क्योकि-] यह सम्मुख भावसे पृथिवी और अन्तरिक्षके रसोको अपनी किरणोंसे लेनेको उनके प्रति लगा हुआ होता है। और ज्योतिषों या ग्रहोकी भासाके प्रति आविष्ट अर्थात् प्रवेश किये हुए रहता है। अथवा भास् या दीप्तिसे प्रविष्ट होता है। [द्युलोक पक्षमें-] और द्यौः [क्यों 'विष्टप्' है?] वह ज्योतियों और पुण्यवानोंसे प्रवेशकी हुई होती है। [आदित्य पक्षमें-] नभस्' (६) आदित्य होता है। [क्योंकि-] भासःओंका नेता होता है। और ज्योतियों-