निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ
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हिन्दी निरुक्त । ६५ का प्रणयण या घुमानेवाला है। अथवा 'भन्' शब्द ही उलटा हो। अर्थात् भासन होता हुआ ही विपरीत होकर नभ' होगया । अथवा 'नहीं प्रकाश होता हुआ नहीं, अर्थात् अवश्य प्रकाश होने- वाला। [द्युलोक पक्षमें-] इससे द्यौ का भी व्याख्यान हो चुका । [अर्थात् ये ही प्रकार उसमें भी जानने जो आदित्य पक्षमें हैं।] ॥२॥ इति हिन्दीनिरुक्ते द्वितीयाध्यायस्य चतुर्थ पादः समाप्तः ।