भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 263, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 263

हिन्दी निरुक्त । ६३ स्थिता भवन्ति । काष्ठा उपदिशो भवन्ति । इतरेतरं क्रान्त्वा स्थिता भवन्ति । आदित्योऽपि काष्ठा उच्यते । क्रान्त्वा स्थितो भवति । आज्यन्तः-अपि काष्ठा उच्यते । क्रान्त्वा स्थितो भवति । आपः- अपि काष्ठा उच्यते । क्रान्त्वा स्थिता भवन्ति-इति स्थावराणाम् ॥ १ ॥ अर्थ । दिव् व आदित्यके नामोंके अनन्तर पन्द्रह ( ५ ) रश्मि (किरण या लगाम) के नाम हैं । 'रश्मि' क्यों ? जलो या अश्वोंके यमन (थाँम्हने) से । उनमें प्रथम पाँच नाम घोडोंकी रश्मियोंके साथ साझेके नाम हैं । रश्मि नामोंके पश्चात् आठ (८) दिशाके नाम हैं । 'दिश्' किस निर्वचनसे ? दिश् अतिसर्जन या दान अर्थ मे (तु० प०) धातुसे । क्योंकि-'अति सृज्यन्ते आसु हविरादीनि देवतानाम्' इनमे देवताओके लिये हविः आदि दी या रखी जाती हैं । ] आसा- दन अर्थात् प्रत्येक वस्तुके आसन्न या समीप रहनेसे । अथवा प्रत्येक वस्तुको अभ्यशन या अपने अन्तर्गत कर लेती हैं, इससे । उनमें 'काष्ठा' यह नाम उनके द्वय्योका होता है । 'काष्ठा' दिशा होती है । क्योंकि वे प्रत्येक वस्तुके प्रति जाकर स्थित होती है । 'काष्ठा' उपदिशा या कोण-दिशा होती हैं । क्योंकि-वे भी परस्परको दबा कर दिशाओंके साथ स्थित होती है । आदित्य भी 'काष्ठा' कहा जाता है । क्योकि-वह भी अपने स्थानको दबा कर १३

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य) · पृष्ठ 263, कुल 1282 में से · BharatKosha