निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । ६३ स्थिता भवन्ति । काष्ठा उपदिशो भवन्ति । इतरेतरं क्रान्त्वा स्थिता भवन्ति । आदित्योऽपि काष्ठा उच्यते । क्रान्त्वा स्थितो भवति । आज्यन्तः-अपि काष्ठा उच्यते । क्रान्त्वा स्थितो भवति । आपः- अपि काष्ठा उच्यते । क्रान्त्वा स्थिता भवन्ति-इति स्थावराणाम् ॥ १ ॥ अर्थ । दिव् व आदित्यके नामोंके अनन्तर पन्द्रह ( ५ ) रश्मि (किरण या लगाम) के नाम हैं । 'रश्मि' क्यों ? जलो या अश्वोंके यमन (थाँम्हने) से । उनमें प्रथम पाँच नाम घोडोंकी रश्मियोंके साथ साझेके नाम हैं । रश्मि नामोंके पश्चात् आठ (८) दिशाके नाम हैं । 'दिश्' किस निर्वचनसे ? दिश् अतिसर्जन या दान अर्थ मे (तु० प०) धातुसे । क्योंकि-'अति सृज्यन्ते आसु हविरादीनि देवतानाम्' इनमे देवताओके लिये हविः आदि दी या रखी जाती हैं । ] आसा- दन अर्थात् प्रत्येक वस्तुके आसन्न या समीप रहनेसे । अथवा प्रत्येक वस्तुको अभ्यशन या अपने अन्तर्गत कर लेती हैं, इससे । उनमें 'काष्ठा' यह नाम उनके द्वय्योका होता है । 'काष्ठा' दिशा होती है । क्योंकि वे प्रत्येक वस्तुके प्रति जाकर स्थित होती है । 'काष्ठा' उपदिशा या कोण-दिशा होती हैं । क्योंकि-वे भी परस्परको दबा कर दिशाओंके साथ स्थित होती है । आदित्य भी 'काष्ठा' कहा जाता है । क्योकि-वह भी अपने स्थानको दबा कर १३