निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त। ६६ भवन्ति । अहिवत् तु खलु मन्त्रवर्णाः ब्राह्मण- वादाश्च । विवृद्ध्या शरीरस्य स्रोतांसि निवारया- ञ्चकार, तस्मिन् हते प्रसस्यन्दिरे आपः । तदभिवा- दिनी-एषा-ऋग् भवति ॥ २ ॥ अर्थ । [ जङ्गम काष्ठा या जलोंके वर्णनमें मन्त्र— ] “हिरण्यस्तूपस्य इयमर्षम्, दासपत्नीरिति च । त्रिष्टुभावेते । 'अग्निष्टोमे निष्केवल्यं नाम शस्त्रम् तत्र निविद्धानीयमेतत् सूक्तम्, तत्र द्वे अपि शस्येते ।” 'अतिष्ठन्ती' मेघके चलते हुए बराबर चलती हुईं 'अनिबेशना' जलाशयकी प्राप्तिसे पहिले कहीं कही रुकनेवाली 'मध्ये' मेघके उदरमें स्थित हुई हुईं काष्ठाआं (जलों) के बाहरसे विधाताने मेघरूप शरीर जो उनको आवरण किये हुए और उन्हींकी रक्षाके लिये है, लगा दिया है। अप् या जल वृत्र (मेघ) के 'निण्य' नीचे स्थानको जिससे वह गमन करता है, जानते हुएके समान नीचेकी ओर जाते हैं, और इन्द्र शत्रु (वृत्र या मेघ) उसके रोकनेवालेके समान दूर तक उसके आगे बढ़ता है, और अन्धकार- को फैला कर स्थित होता है । इस मन्त्रमें वर्षाकालीन मेघका स्वभाव और रूप वर्णन किया है। वर्षाऊ बादलकी काली काली घटाएं नीचेको पृथ्वीकी ओर लटक आती हैं और दूरतक फैल जाती हैं। बादलके भीतरका पानी भारीपनसे नीचेको आता है और उसीके साथ उसका धूम- आदि-मय शरीर भी उसके आगे तक फैल जाता है। मानो एककी स्पर्धासे एक आगे बढ़ता है, यही दृश्य इस मन्त्रके द्वारा देख रहा है।