निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 266, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ें३०० २ अ० ५ पा० २ ख० । [ निरुक्तार्थ ] नहीं ठहरने वालियोंके, नहीं निवेश ( प्रवेश ) करनेवालियोंके, यह स्थावर (चल) जलोंका (वर्णन है।) काष्ठाओंके बीचमें (रहते हुए) (विधाताने बाहरसे) शरीर रख दिया। शरीर नाम मेघ। "शरीर" शब्द ‘शॄ’ हिंसायाम्- (क्रयादि० प०) धातुसे होता है। [क्योंकि वह इन्द्रदेवसे विदा- रण किया जाता है।] अथवा हिंसार्थक 'शम्' (क्रया० प०) धातुसे है। 'वृत्र' के 'निण्य' निर्णाम नीचेको झुके हुए स्थानको 'विचरन्ति' विशेषरूपसे जाती हैं। "आपः" जल। "दीर्घ" शब्द 'द्राघ्' वृद्धयर्थक (भ्वा० आ०) धातुसे होता है। [क्योंकि वह बढ़ा हुआ होता है।] "तमस्" शब्द विस्तार अर्थमें 'तनु' (त० उ०) धातुसे है। [क्योंकि वह विस्तृत होता है।] "आशयत्" पद 'आङ्' (३ प०) और 'शीङ्' स्वप्ने (अदा० आ०) धातुसे है। "इन्द्रशत्रु" [क्यों ?] इन्द्र इसका शमन करनेवाला है। अथवा शातन या छेदन करनेवाला है। इससे वह 'इन्द्रशत्रु' है। सो कौन "वृत्र" है ? 'मेघ' यह निरुक्तके आचार्य कहते हैं। 'त्वष्टाका पुत्र असुर है' यह इतिहासके जाननेवाले कहते हैं। जलोंके और ज्योति या बिजलीके मेलसे वृष्टि होती है। तहाँ मन्त्रोंमें उपमा रूपसे इन्द्र और वृत्रासुरके युद्धका वर्णन है। अहिके समान और वृत्रके समान मन्त्रोंके वर्ण और ब्राह्मण ग्रन्थोंके वाद हैं। [वृत्रने] शरीरको वृद्धिसे स्रोतों या जलके प्रवाहोंको रोका, इन्द्रके द्वारा उसके विदीर्ण होते ही जल झरे (बरसे) उसको कहनेवाली यह ऋचा है ॥ २ ॥ व्यवस्था । मन्त्रोंमें देवताओं और असुरोंके संग्रामका वर्णन बाहुल्यसे आता है, किन्तु उसमें सन्देह होता है, क्या यह वास्तव है या रूपक ?