निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 267, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । १०१ यास्क आचार्य व्यवस्था देते हैं कि—नैरुक्त आचार्य इसे रूपक मानते हैं, और ऐतिहासिक उसे सच्चा इतिहास मानते हैं, जो कि- स्वयम् तहाँ तहाँ मन्त्रवर्णों से ही प्रमाणित है, किन्तु रूपक होनेमें प्रमाणकी अपेक्षा है, इसीसे आप उसे यों दिखाते हैं—यदि 'वृत्र' नाम मेघका है, तो मन्त्रोंमें जो संग्रामका श्रवण होता है, उसकी क्या सङ्गति है। [ उत्तर ] मेघके भीतर पानी और उपयुक्त बिजलीके मेलसे वर्षा होती है। वैद्युत ज्योति वायुसे लिपटा हुआ होकर जिसे इन्द्र कहते हैं, जलको ताडन करता है, और उस ताडनके वश जल बरसने लगते हैं। वहाँ पर इसी प्रकारके जल और तेजके विरुद्ध- भावको युद्धके रूपमें वर्णन किया गया है, इस लिये मन्त्रोंमें युद्ध वर्णन रूपकमात्र है, क्योंकि न वास्तविक कोई युद्ध है और न इन्द्रके कोई शत्रुही हैं। मन्त्र भी इस बातको प्रमाणित करता है:— यदचरस्तन्वा वावृधानो बलानीन्द्र प्रब्रुवाणो जनेषु । मायेत्सा ते यानि युद्धान्याहुर्नाद्य शत्रुं न नु पुरा विवित्से ॥ [ ऋ० सं० ८, १, १५, २ ] वामदेवस्य बृहदुक्थस्य आर्षम् । त्रिष्टुप् । व्यूढस्य अष्टमे अहनि निष्केवल्ये शस्यते । अर्थः—हे इन्द्र ! जो तू शरीरधारी होकर फिर फिर बढ़ता हुआ, मनुष्योंमें अपने वीर्योंको कहता हुआ जैसा, नानाप्रकारके कर्म करता है, [ क्या तू वैसा ही है ? ] नहीं। वह सब तेरो माया ही है, और [ ऐतिहासिक ] जो तेरे युद्धोंको वर्णन करते हैं, यह