भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 268, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 268

१०२ २ अ० ५ पा० ३ ख० । भी तेरी माया ही है। न तेरा अब कोई शत्रु है और न पहिले ही था, यह मैं ही नहीं जानता बल्कि—तू भी यह सब जानता ही है। इस प्रकार इस मन्त्रमें युद्धको मायारूप वर्णन किया है। और भी ब्राह्मण ग्रन्थमें कहा है— “वीर्य्यं वै प्रावोर्य्यमिन्द्र इति ह विज्ञायते” अर्थात् 'जितना संसारमें वीर्य है, वह इन्द्र ही है',—फिर कौन उसका शत्रु और किसके साथ उसका युद्ध हो। एवम्— “तद्वाहु नैतदस्ति यद् देवासुरमिति” अर्थात् यह सब ऐसा ही नहीं है, जैसा कि देव और असुरोंका संग्राम वर्णन किया है। अतः ठीक ही कहा है, कि—‘जल और विद्युत्के मेलसे वर्षा होती है, और युद्ध वर्णन उपमा मात्र है' ॥ २ ॥ [ खं० ३ ] ( निरु० ) “दासपत्नीरहिंगोपा अतिष्ठन् निरुद्धा आपः पणिनेव गावः । अपां बिलमपिहितं यदासीद् वृत्तं जघन्वां अप तद्ववार ॥” “दासपत्नीः” दासाधिपत्याः । 'दासः' दस्यतेः । उपदासयति कर्माणि । “अहिगोपा अति- ष्ठन्” । अहिना गुप्ताः । 'अहिः'-अयनात् । एति-अन्तरिक्षे । अयमपि-इतरः-'अहिः' एतस्मा- देव । निर्ह्रसितोपसर्गः-आहन्ति-इति । “निरुद्धा

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