निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०४ २ अ० ५ पा० ३ खं० । इन्द्रने वृत्र या मेघंको हनन किया और उस द्वारको खोला, तथा जल वृष्टिरूपसे गिरे ॥ [ एक-पद निरुक्त ] "दासपत्नी" दासकी अधिपत्नियें या दास- के पेटमें स्थित होकर उसकी रक्षा करनेवालीं । [ अर्थात् जब नौकर काम करता हुआ थक जाता है, तब जलके पानसे उसे बल मिलता है, और उसकी थकावट दूर हो जाती है, यह जलसे दास- की रक्षा है । ] [ विग्रह-प्रसक्त ] 'दास' शब्द 'दसु' उपक्षये ( दि० प० ) धातुसे है । [ क्योंकि-] वह कृषि आदि कर्मोंको सम्पादन करता है। "अहिगोपाः-अतिष्ठन्" अहि (मेघ) से रक्षित हुई स्थित थीं । 'अहि' [ क्यों ? ] अयन या गमनसे अन्तरिक्ष (आकाश) में गमन करता है । यह भी 'अहि' शब्द जो सर्पका नाम है इसी धातुसे बनता है; क्योंकि—वह भी चलनेवाला है । अथवा उपसर्गको ह्रस्व करके 'अहि' कहा जाता है । [क्योंकि-] वह 'आहन्ति भोगेन' अर्थात् शरीरसे चलता है ] 'आङ्' पूर्वक 'हन्' हिंसागत्योः (अ० प०) धातुसे होता है । "निरुद्धा आपः पणिना इव गावः” वणियेसे गोओंके समान रुके हुए जल । 'पणि' नाम वणिक् या वणियेका है । [ यह पर्यायसे तत्व-कथन है ] 'पणि' [ क्यों ? ] पणन या लेन देनसे । [ क्योंकि-वह पणन या व्यवहार करता है ] [ पर्याय-प्रसक्त ] 'वणिज्' (क्) [ क्यो ? ] वह पण्य (माल) को नित्य सुधारता रहता है, [ जिससे कि वह मूल्यके योग्य हो जावे । ] जब जलोंका बिल मुँदा हुआ था । 'बल' [ क्यों ? ] वह जल आदिसे भरा हुआ रहता है। 'डुभृञ्' धारणपोषणयोः ( जु० उ० ) धातुसे है। 'वृत्रको मारा और उसे खोला।' वृत्र' शब्द 'वृञ्' वरणे (स्वा० ) धातुसे । अथवा 'वृधु' वृद्धौ ( भ्वादि० आ० ) धातुसे । जो कि—वह आकाश अथवा जलसे महान् होनेसे आवरण कर लेता है, यही वृत्रका वृत्रपना