निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । १०५ है । ऐसे ही ब्राह्मणसे जाना जाता है । अथवा इन्द्रसे हत हुआ वृत्र या मेघ जलोंके बिलके खुल जाने पर जलोंको वृष्टिरूपसे वर्षाता है, यही वृत्रका वृत्रपना है, यह ब्राह्मणमें जाना जाता है । अथवा बहुत बढ़ जाता है, यह वृत्रमें वृत्रपना है, यह ब्राह्मणमें जाना जाता है ॥ ३ ॥ व्याख्या— इस मन्त्रमें “दासपत्नी” विशेषणसे शूद्रोंका सेवाधर्म और “पणिनैव गावः” इस दृष्टान्तसे वैश्योंका गोसेवा और वाणिज्य धर्म कहा गया है । “कृषि-वाणिज्य गोरक्षा वैश्यकर्म स्वभावजम्” [ भ० गी० १८, ४४ ] अर्थात् भगवद्गीतामें 'कृषि, वाणिज्य और गोरक्षा ये वैश्यके स्वाभाविक कर्म है' कहा है । इस उदाहरणसे स्पष्ट प्रतीत होता है कि-वृत्र मेघ है, असुरमें जलोंका रुकना और उसके हननसे वृष्टि होना संभव नहीं । यह नैरुक्त-पक्षमें प्रमाण है ॥ ३ ॥ इति हिन्दीनिरुक्ते द्वितीयाध्यायस्य पञ्चमः पादः ॥२, ५॥ १४