निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
हिन्दी निरुक्त । १०५ है । ऐसे ही ब्राह्मणसे जाना जाता है । अथवा इन्द्रसे हत हुआ वृत्र या मेघ जलोंके बिलके खुल जाने पर जलोंको वृष्टिरूपसे वर्षाता है, यही वृत्रका वृत्रपना है, यह ब्राह्मणमें जाना जाता है । अथवा बहुत बढ़ जाता है, यह वृत्रमें वृत्रपना है, यह ब्राह्मणमें जाना जाता है ॥ ३ ॥ व्याख्या— इस मन्त्रमें “दासपत्नी” विशेषणसे शूद्रोंका सेवाधर्म और “पणिनैव गावः” इस दृष्टान्तसे वैश्योंका गोसेवा और वाणिज्य धर्म कहा गया है । “कृषि-वाणिज्य गोरक्षा वैश्यकर्म स्वभावजम्” [ भ० गी० १८, ४४ ] अर्थात् भगवद्गीतामें 'कृषि, वाणिज्य और गोरक्षा ये वैश्यके स्वाभाविक कर्म है' कहा है । इस उदाहरणसे स्पष्ट प्रतीत होता है कि-वृत्र मेघ है, असुरमें जलोंका रुकना और उसके हननसे वृष्टि होना संभव नहीं । यह नैरुक्त-पक्षमें प्रमाण है ॥ ३ ॥ इति हिन्दीनिरुक्ते द्वितीयाध्यायस्य पञ्चमः पादः ॥२, ५॥ १४
१०६ २ अ० ६ पा० १ खं० । : षष्ठः पादः । ( निघ० ) श्यावी ( १ ) । क्षपा ( २ ) । शर्वरी ( ३ ) । अक्तुः ( ४ ) । ऊर्म्या ( ५ ) । राम्या ( ६ ) । यम्या ( ७ ) । नम्या ( ८ ) । दोषा ( ९ ) । नक्ता ( १० ) । तमः ( ११ ) । रजः ( १२ ) । असिक्नी ( १३ ) । पयस्वती ( १४ ) । तमस्वती ( १५ ) । घृताची ( १६ ) । शिरिणा ( १७ ) । मोकी ( १८ ) । शोकी ( १९ ) । ऊधः ( २० ) । पयः ( २१ ) । हिमा ( २२ ) । वस्वी ( २३ ) । इति त्रयोविंशती रात्रि- नामानि ॥ ७ ॥ विभावरी ( १ ) । सूनरी ( २ ) । भास्वती ( ३ ) । ओदती ( ४ ) । चित्रा मघा ( ५ ) । अर्जुनी ( ६ ) । वाजिनी ( ७ ) । वाजिनीवती ( ८ ) । सुम्नावरी ( ९ ) । अहना ( १० ) । द्योतना ( ११ ) । श्वेत्या ( १२ ) । अरुषी ( १३ ) । सूनृता ( १४ ) । सूनृतावतो ( १५ ) । सूनृतावरी ( १६ ) । इति षोडश उषोनामानि ॥ ६ ॥ :( खण्ड १ ) ( निरु० ) रात्रिनामानि-उत्तराणि त्रयो- विंशतिः । रात्रिः कस्मात् ? प्ररमयति भूतानि ।
हिन्दी निरुक्त । १०७ नक्तं चारोणि-उपरमयति, इतराणि ध्रुवीकरोति । राते र्वा स्याद् दानकर्मणः । प्रदीयन्ते अस्याम् अवश्यायाः । उषोनामानि उत्तराणि षोडश । उषाः कस्माद् ? उच्छति इति सत्याः । रात्रे रपरः कालः । तस्या एषा भवति ॥ १ ॥ अर्थ । 'काष्ठा' यह अनेक द्रव्यका नाम होता है,-यहाँसे दिशाओंके प्रसंग ओर अनुप्रसंगकी बातें कही गईं, अब प्रकृतकी व्याख्या होती है— दिशाके नामोंसे आगे तेईस ( २३ ) रात्रिके नाम हैं । [ रात्रिमें तम या अँधेरा ही पदार्थ है, और वह दिशाओंमें ही अपनी स्थिति करता है, इससे दिङ्नामोंके अनन्तर रात्रिनाम कहे गये हैं । ] 'रात्रि' क्यों है ? जब यह भी आती है, तो नक्तंचरो ( रात्रिके विचरनेवालों ) को रमण कराती है। [ क्योंकि-वे दिनके बीत जाने पर, रात्रिके आते ही, अपने विहारका समय जान कर विशेष- रूपसे रमण करते हैं । और वही अन्य दिवाचारी मनुष्य आदि प्राणियोंका भी उपरमण कराती है, अर्थात् रात्रिके आजाने पर अपने अपने कार्योंसे निवृत्त होकर निवासके लिये स्थिर हो जाते हैं । अथवा दानार्थ 'रा' ( अदा० प० ) धातुसे है । [ क्योंकि-] उसमें अवश्यःय ( तुषार ) या ओस गिरती है। इन्हींका प्रदान करनेसे यह रात्रि हैं । क्योंकि-रात्रिका ही पिछला समय 'उषस्' ( उषा ) कहलाता है, इसीसे रात्रिनामोंके पश्चात् सोलह ( १६ ) 'उषा' के नाम हैं।
१०८ २ अ० ६ पा० २ खं० । 'उषा' क्यों है ?. जिससे कि यह अँधेरेको निवृत्त करती है । 'उच्छी' विवासे ( भू० प० ) धातुसे कर्त्तृकारकमें है । 'उषा' रात्रिका पिछला समय है, इसको कहनेवाली यह ऋचा है—॥ १ ॥ ( खण्ड २ ) [ निरु० ) “इदं॒ श्रेष्ठं॒ ज्योति॑षां॒ ज्योति॒रागा- च्चित्रः प्रके॒तो अ॑जनिष्ट॒ विभ्वा । यथा॑ प्रसू॒ता स॑वि॒तुः सवाय॑ ए॒वा रात्र्यु॒षसे॒ योनि॑मारैक् ॥” “इदं॒ श्रेष्ठं॒ ज्योतिषां ज्योतिः”-आगमत् । चित्रं प्रकेतनं प्रज्ञाततमम् “अजनिष्ट” विभूततमम् । “यथा प्रसूता सवितुः” प्रसवाय रात्रिः आदित्यस्य एवं “रात्रौ उषसे योनिम्” अरिचत्, स्थानम् । स्त्री- योनिः । अभियुतः एनां गर्भः । तस्या एषा अपरा भवति ॥ २ ॥ अर्थ । आदित्यादीनां “ज्योतिषां” मध्ये “श्रेष्ठम्” “इदम्” उषो लक्षणं “ज्योतिः” “आगात्” आ- गच्छति । “चित्रः” ‘चित्र’ चायनीयं पूजनीयं वा श्रेष्ठत्वादेव, “प्रकेतः” ‘प्रकेतनं’ ‘प्रज्ञाततमं’ “विभ्वा” ‘विभूततमम्’ “अजनिष्ट” जातमित्यर्थः । “यथा” “प्रसूता” प्रसवमनुप्राप्ता “रात्रि” “सवितु”
हिन्दी निरुक्त । १०६ ‘आदित्यस्य’ “सवाय” ‘प्रसवाय’ आदित्योत्सृष्टे देशे जायते “एवा एवम् “रात्री” “उषसे” “यो- निम्” ‘स्थानम्’ “आरिचत्” आरेचयति-ददाति- इत्यर्थः ॥ “इदं श्रेष्ठम्” इति आङ्गिरसस्य कुत्सस्य इयम्-आर्षम्, उत्तरा च । उभे अपि त्रिष्टुभौ एते । प्रातरनुवाकाश्विनयोः शस्येते । आदित्य आदि ज्योतियोंमें, अति शीत अति उष्ण (गरम) न होनेके कारण श्रेष्ठ यह उषा रूप ज्योति आता है। अपनी श्रेष्ठता- से ही पूजनीय अति प्रसिद्ध और अन्य छोटे ज्योतियोंकी अपेक्षा- अधिक व्यापक है। जिस प्रकार जनती हुई रात्रि आदित्यको जननेके लिये उसके स्थानसे दूसरे स्थानमें हो जाती है, उसी प्रकार उषाके लिये भी स्थान देती है। जिस प्रकार उषा आदित्यके जन्मका कारण है, क्योंकि-वह उस (उषा) के अनन्तर ही होता है, उसी प्रकार रात्रि उषाका हेतु है। इस रीतिसे ‘इस ऋचामें रात्रिका अपर (पिछला) भाग ही ‘उषा हुआ।’ यह प्रतीत होता है। यह ज्योतियोंमें श्रेष्ठ (उत्तम) ज्योति (उषा) आती है। चित्र या पूजनीय, प्रकेतन नाम बहुत प्रसिद्ध और अधिक व्यापक हुआ। जैसे प्रसव या जननेवाली रात्रि सूर्यके प्रसव (जनने) के लिये है, उसी प्रकार रात्रि उषाके लिये स्थान देती है। [यह भी दूसरी] स्त्रीकी योनि [इसी धातुसे है] क्योंकि-गर्भ इसके साथ मिला हुआ रहता है। उसी उषाके लिये यह दूसरी और
११० २ अ० ६ पा० ३ खं० । ऋचा है । [ रात्रिका अन्तिम भाग 'उषा' कहलाता है'—इसी अर्थकी दृढ़ताके लिये यह और ऋचा है ।] ॥ २ ॥ व्याख्या । ‘इदं चित्रम्’ इस ऋचामें योनि शब्द स्थानके लिये आया है । ‘यु’ मिश्रणे ( अदा० प० ) धातुसे है । युत होनेसे वह योनि है । क्योंकि-जो जिसमें होता है वह उससे युत या मिला हुआ ही होता है, इस न्यायसे रात्रिमें उषा होती है, इससे वह उसके साथ युत या मिली हुई है, और इससे उषाकी योनि रात्रि है । यास्क मुनि कहते हैं कि—लोकमे ‘योनि’ शब्दसे स्त्री-योनि ली जाती है, वह भी इसी धातुसे है, क्योंकि-उसके साथ भी गर्भ मिला हुआ रहता है । यास्काचार्यके मतमें ‘योनि’ शब्द पुंलिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग दोनों प्रकारका है । यह उनके प्रयोगसे सिद्ध है ॥ २ ॥ ( खण्ड ३ ) ( निघ० ) वस्तोः ( १ ) । द्यौः ( २ ) । भानुः ( ३ ) । वासरम् ( ४ ) । स्वसराणि ( ५ ) । घंसः ( ६ ) । घर्मः ( ७ ) । द्युक्षः ( ८ ) । दिनम् ( ९ ) । दिवा ( १० ) । दिवे दिवे ( ११ ) । द्यवि द्यवि ( १२ ) । इति द्वादशाह्नामानि ॥ ६ ॥ [ निरु० ] “रुशद्वत्सा रुशती श्वेत्यागादा- रैगु कृष्णा सदनान्यस्याः । समानबन्धू अमृते अनूची १द्यावावर्णं चरत आमिनाने ॥ १ ‘द्यावा’ पद प्रथमा-विभक्तिके द्विवचन और, तृतीया विभक्तिके एक वचनमें होता है ।
“रुशद्वत्सा” सूर्यवत्सा । : “रुशत्”-इति वर्णनाम । रोचते-र्ज्वलति कर्मणः । सूर्य्यमस्या वत्सञ्जाहुः । साहचर्य्याद् रसहर- णाद्-वा । “रुशती श्वेत्या गात् ।” “श्वेत्या” श्वेततेः । अरिचत् “कृष्णा” सदनानि अस्याः । कृष्णवर्णा रात्रिः । ‘कृष्ण’ कृष्यतेः निकृष्टो वर्णः । अथ-एने संस्तौति-“समानबन्धू” समानबन्धने “अमृते” अमरणाधर्माणौ ‘अनूची’-इति-इतरे- तरमभिप्रेत्य । “द्यावा वर्णं चरतः” ते एव । द्यावौ द्योतनात् । अपि वा “द्यावा चरतः” ‘तया चरतः’-इति स्यात् । “आमिनाने” अन्योन्यस्य अध्वात्मं कुर्वाणे । अहर्नामानि उत्तराणि द्वादश । अहः कस्मात् ? उपाहरन्ति अस्मिन् कर्माणि । तस्य-एष निपातो भवति, वैश्वानरीयायाम्-ऋचि ॥ ३ ॥ अर्थ । “रुशद्वत्सा” सूर्यवत्सा “रुशती” चात्मनाऽपि रोचनशीला “श्वेत्या” श्वेतवर्णा (उषाः) “आगात्” आगच्छति । “कृष्णा” कृष्णवर्णा रात्रिः च “अस्याः” सदनानि “आरैक्” आरेचयति जहातीत्यर्थः ।
११२ २ अ० ६ पा० ३ खं० । उभे मिलिते स्तौति—"समानबन्धू" समानबन्धने समानबन्धू च "अमृते" अमरण धर्माणी "अनूची" इतरेतरं संश्लिष्टे "द्यावा" द्यावी द्योतनशीले । वा द्यावा सह "आमिनाने" अन्योन्यस्य अध्यात्मं कुर्वाणे "चरतः" गच्छतः इत्यर्थः ॥ 'रुशत्' चमकीले 'वत्स' बछड़ेवाली स्वयम् 'रुशती' चमकती 'श्वेत्या' सफेद (उषा) आती है। और काली (रात्रि) इसके स्थानोंको छोड़ती जाती है। [मिलित स्तुति] दोनों [रात्रि और उषा] सूर्यरूप एक बन्धन या एक बन्धुवालीं, कभी नहीं मरनेवालीं, आपसमें मिली हुईं, एक दूसरीको अपनेमे करती हुईं चलती हैं ॥ "रुशद्वत्सा" नाम सूर्यरूप बछड़ेवाली । 'रुशत्' यह वर्ण (चमकीले रङ्ग) का नाम है। प्रकाश अर्थवाले 'रुच्' (भ्वा० आ०) धातुसे है। मन्त्रका देखनेवाला ऋषि उस सूर्यको इस (उषा) का वत्स कहता है। [क्योंकि-] बच्छा अपनी माँके साथ रहता है, वैसे ही यह भी उषाके साथ रहता है। इस साहचर्य्यकी समानतासे सूर्य उषाका वत्स है। अथवा जैसे बच्छा अपनी माँको ऊँधोसे दुग्धरूप रसको हर लेता है, वैसे ही यह सूर्य प्रभात (उषा) कालको ओसको अपनी किरणोंसे हर लेता है। इस रस-हरण क्रियाकी समानतासे सूर्य उषाका वत्स है। 'रुशती' चमकीली 'श्वेत्या' सफेद रंगवाली 'आगात्' आती है। 'श्वेत्या' शब्द वर्णार्थक 'श्वित्' (भ्वा० आ०) धातुसे है। कृष्णने इसके स्थानोंको छोड़ा या दिया। 'कृष्ण' नाम काले रंगवाली रात्रिका है। 'कृष्ण' शब्द 'कृष्' (दि० प०) धातुसे है। निकृष्ट-अधम
हिन्दी निरुक्त । ११३ रंगका नाम है। [क्योंकि-वह स्वयम् अँधेरेका रंग और अन्य वस्तुओंकी प्रतीतिका विरोधी है। अब इस ऋचाके उत्तरार्द्धसे इन रात्रि और उषा दोनोंकी स्तुति करता है। "समान बन्धू" ये रात्रि और उषा दोनों एक बन्धनमें बंधी हुई हैं। क्योंकि रात्रि आदित्यके अस्त (छिपने) से बँधी हुई या मिली हुई है। और उषाः उसके उदयसे बंधी हुई है। "अनन्चे" दोनों आपसमें एक दूसरेसे मिली हुई। "द्यावा वर्ण, चरतः" दोनों रात्रि और उषा अपने अपने वर्णको प्रकाशित करती हुई साथ चलती हैं। अथवा द्युलोकके साथ स्पर्धा करती हुई दोनों चलती हैं ! 'द्यो' क्यों है ? द्योतन या प्रकाशनसे । 'द्युत' दीप्तौ (भ्वा० आ०) धातुसे है। "आमिनाने" आपसको आत्मा में (आपसमें) करनेवालीं ॥ 'उषस्' शब्दके अर्थ तत्त्वको निश्चय करानेके लिये ये दोनों मन्त्र आये थे, इनका वर्णन हो चुका। अब प्रस्तुत-विषय कहा जाता है :— 'उषा' के नामोंके पश्चात् अहन् (दिन) के बारह नाम हैं। 'अहन्' क्यों ? इसमें सब प्राणी कर्मोंको करते हैं। 'हृञ्' हरणे (भ्वा० उ०) धातुसे है। उस 'अहन्' शब्दका नैघण्टुक या गौण वृत्तिसे वैश्वानर देवताकी ऋचामें यह निपात या उपयोग है।—॥ ३॥ (खण्ड ४) (निरू०) "अहश्च कृष्णमहरर्जुनञ्च विवर्त्तेते रजसी वेद्याभिः । वैश्वानरो जायमानो न राजा वाति रञ्ज्योतिषाग्निस्तमांसि ॥
११४ २ अ० ६ पा० ४ ख० । “अहश्च कृष्णं” रात्रिः, शुक्लं “च-अहः-अर्जुनं विवर्त्तेते रजसी” “वेद्याभिः” वेदितव्याभिः प्रवृत्तिभिः “वैश्वानरो जायमानः” इव उद्यन् आदित्यः सर्वेषां ज्योतिषां “राजा” अवाहन् “अग्निः ज्योतिषा तमांसि” ॥ [ निघ० ] अद्रिः ( १ )। ग्रावा ( २ )। गोत्रः ( ३ )। - वलः ( ४ )। अश्मः ( ५ )। पुरुभोजाः ( ६ )। वलिशानः ( ७ )। अश्मा ( ८ )। पर्वतः ( ६ )। गिरिः ( १० )। व्रजः ( ११ )। चरुः ( १२ )। वराहः ( १३ )। शम्बरः ( १४ )। रौहिणः ( १५ )। रैवतः ( १६ )। फलिगः ( १७ )। उपरः ( १८ )। उपलः ( १६ )। चमसः ( २० )। अहिः ( २१ )। अभ्रम् ( २२ )। वलाहकः ( २३ )। मेघः ( २४ )। दृतिः ( २५ )। ओदनः ( २६ )। वृषन्धिः ( २७ )। व्ववः ( २८ )। असुरः ( २६ )। कोशः ( ३० )। इति त्रिंशन्मेघनामानि ॥ १० ॥ ( निरु० ) मेघनामानि उत्तराणि त्रिंशत् । ‘मेघः’ कस्मात् ? मेहति इति सतः । आ ‘उपरः’ ‘उपलः’ इति-एताभ्यां साधारणानि पर्वतनामभिः । ‘उपरः’ ‘उपलः’-मेघो भवति । उपरमन्ते अस्मिन्-
हिन्दी निरुक्त । ११५ अभ्राणि । उपरता आपः-इति वा । तेषामेषा भवति ॥ ४ ॥ अर्थ । क्योंकि 'अहन्' शब्द रात्रि और दिन दोनोंका ही वाचक है, इससे सन्देहका स्थान है । इसका विभाग इस ऋचामें विशेषणके भेदसे दिखाया है । 'भारद्वाजस्य इयमर्षम् । त्रिष्टुप् । पृष्ठस्य षष्ठे अहनि आग्निमारुते शस्त्रे शस्यते ।' काला दिन (रात्रि) सुपेद दिन (दिन) दोनों बदलते रहते हैं-रात्रि बीतो दिन आया, दिन बीता रात आई । दोनों प्राणियोंकी अनन्त प्रवृत्तियोंसे (अथवा ज्योति (प्रकाश) से दिन, और अँधेरेसे रात्रि ।) “रजसी” रञ्जक या प्रीतिके देनेवाले है । “वैश्वानर” अग्नि “जायमान” उदय होते हुए ज्योतियोंके राजा सूर्यके समान अपने “ज्योतिष्” प्रकाशसे “तमांसि” अँधेरोंको “अवातिरत्” 'अवाहन्' दूर करता है । व्याख्या । इस ऋचामें एक ही 'अहन्' शब्द 'कृष्ण' विशेषण लगानेसे रात्रिका और अर्जुन (शुक्ल) विशेषण लगानेसे दिनका वाचक होता है । इसी रीतिसे सन्देहके स्थानमे विशेषण आदिके सम्बन्ध- से शब्दका विशेष अर्थ निर्णीत करना चाहिये । वेदितव्या । 'विदित' नाम जानी हुई वस्तुओंका कदाचित् अन्त हो सकता है, किन्तु जो वेदितव्या या अभी नहीं जानी गई हैं किन्तु जानने योग्य है (जानी जावेंगी) उनका अन्त नहीं हो
११६ २ अ० ६ पा० ५ खं० । सकता, अर्थात् कौन कह सकता है वे कितनो हैं, इसी प्रकार वेदि- तव्या नामसे मन्त्रमें अनन्त अर्थ लिया गया है । ( निरु० ) [ क्योंकि-मेघ रात्रि और दिनमें ही होते हैं, इससे उनके ] पश्चात् तीस मेघके नाम हैं । 'मेघ' शब्द किस निर्वचनसे है ? 'मेहति' सेचन करता है, इस कर्त्तृ वाच्य ( 'मिह' सेचने ) ( भ्वा० प० ) धातुसे है । मेघ नामोंमें 'उपर' उपल' इन दो नामोंसे पूर्व सब नाम पर्वतनामोके साथ साधारण हैं । अर्थात् मेघ और पर्वत दोनोंके नाम हैं । 'उपर' और 'उपल' मेघ होता है । क्योंकि इसमें अभ्र ( मेघ ) उपरत या आकर स्थित होते हैं । अथवा इसमें जल उपरत होते हैं । र और ल के अभेदसे 'उपर' शब्दसे ही ‘उपल’ शब्द बन जाता है । उन मेघोंकी 'उपर' शब्द वाच्यतामें विशेष लिङ्गको बतानेवाली यह ऋचा है—॥ ४ ॥ ( खण्ड ५ ) ( निरु० ) “देवा॒नां मा॒ने प्रथ॒मा अतिष्ठन् कृन्तत्रा॑देषामु॒परा॑ उ॒दाय॑न् । त्रय॑स्तपन्ति पृथि॒वी- मनू॑पा द्वौ बृ॒बूकं॑ वहतः पुरी॒षम् ॥ ‘ [ ऋ० स० ७, ७, १६, ३ ] “देवा॒नां” निर्माणे “प्रथ॒मा अतिष्ठन्” मा- ध्यमिका देवगणाः । ‘प्रथस’ इति मुख्यनाम । प्रतमो भवति । विकर्त्तनेन मेघानामुदकं जायते । “त्रय॑स्तपन्ति पृथिवीमनूपाः” पर्जन्यो वायु रा- दित्यः शीतोष्णवर्षैः ओषधीः पाचयन्ति ‘अनूपाः’ अनुवपन्ति लोकान् स्वेन स्वेन कर्मणा । त्रयमपि
[Header] हिन्दी निरुक्त। ११७
इतरः-'अनूपः' एतस्मादेव । अनूप्यते उदकेन । अपि वा 'अन्वाप्'-इति स्यात् यथा 'प्राक्' इति । तस्य 'अनूपः' इति स्यात् । यथा 'प्राचीनम्' इति । “द्वा ब्बूकं वहतः पुरीषम्” वाय्वादित्यौ उदकम् । 'ब्बूकम्' इति-उदकनाम । ब्रवीते र्वा शब्दकर्मणः । भ्रंशते र्वा । 'पुरीषं' पृणातेः, पूरयते र्वा ॥ ५ ॥ इति द्वितीयाध्यायस्य षष्ठः पादः ॥ २, ६ ॥ अर्थ । 'उपर' शब्दकी मेघवाचकतामें उदाहरण मन्त्र । उदाहरणमें आये हुए 'प्रथम' 'अनूप' 'ब्बूक' और 'पुरीष' शब्दका निर्वचन । “वसुक्रस्य इन्द्रपुत्रस्य इयमर्षम् । त्रिष्टुप् । महाव्रते मरुत्वतीये शस्यते ।” मन्त्रार्थ—प्रजापतिके द्वारा देवताओंके निर्माणमें मध्यम लोकके देवता ही प्रथम ( मुख्य ) हुए । [ क्योंकि-मेघके अभावमें वृष्टि नहीं हो सकती और वृष्टिके बिना जब जगत् नहीं रह सकता, इसीसे इन मध्यम देवताओंकी उत्कृष्टता है । ] इन मेघोंके कृन्तन कर्त्तन या छेदनसे उपर ( जल ) “उदायन्” आते हैं । तीन अनूप देवता पृथिवीको तपाते हैं । दो देवता पुरीष या तृप्तिके देनेवाले पुरीष ( जल ) को धारण करते हैं । भाष्यार्थ-[ १म पाद ] देवताओंके निर्माणमें माध्यमिक देवगण प्रथम स्थित हुए । प्रथम यह मुख्यका नाम है । [ क्योंकि ] वह प्रतम या प्रकृष्टतम ( उत्तम ) होता है । [ २य पाद्-] मेघोंके विकर्त्तन [ काटनेसे ] उदक ( जल ) होता है । [ ३य पाद् ] तीन अनूप
११८ २ अ० ६ पा० ५ खं० । पृथिवीको तपन करते हैं। अर्थात् पर्जन्य (मेघ) वायु (पवन) और आदित्य (सूर्य) शीत (ढंढक) उष्ण (गरमी) और वर्ष (वृष्टि) से ओषधियोंको पकाते हैं । अनूप। क्योंकि-वे अपने अपने कर्मसे लोकोंको समयके अनुसार अनुगृहीत करते हैं। यह दूसरा भी (देश विशेषका वाचक) 'अनूप' शब्द इसी अनु (उप०) पूर्वक 'डुवप्' बीजसन्ताने (भ्वा० उ०) धातुसे है। क्योंकि वह भी जलसे भरा जाता है। अथवा अनु (उप०) 'आप्' (स्वा० प०) धातुसे 'अन्वाप्' शब्द होगा। क्योंकि वह जलसे व्याप्त होता है। जैसे 'प्राच्' शब्द। उसका अनूप'यह शब्द बन जायगा। जैसे 'प्राचीन' यह। [४र्थ पाद] दो पुरीष बूबूकको धारण करते हैं। दो वायु और आदित्य। 'बूबूक' जल। 'बूबूक' यह जलका नाम है। शब्दार्थक 'ब्रूञ्' (अदा० उ०) धातुसे है। अथवा 'भ्रंश' अधःपतने (भ्वा० आ०) धातुसे हैं। [क्योंकि-वह मेघसे गिरता है।] 'पुरीष' शब्द 'पृ' पूरणे (क्र्यादि प०) धातुसे है। [क्योंकि-वह जलाशयोंको पूर्ण कर देता है।] अथवा तृप्त्यर्थक 'पूर' (चु० उ०) धातुसे बनता है [क्योंकि-वह प्राणियोंकी तृप्ति करता है।] इति हिन्दी-निरुक्ते द्वितीयाध्यायस्य षष्ठः पादः ॥२,६॥ ──────────────
हिन्दी निरुक्त । ११६ सप्तमः पादः । [ निघ० ] श्लोकः ( १ ) । धारा ( २ ) । इला ( ३ ) । गौः ( ४ ) । गौरी ( ५ ) । गान्धर्वी ( ६ ) । गभीरा ( ७ ) । गम्भीरा ( ८ ) । मन्द्रा ( ९ ) । मन्द्राजनी ( १० ) । वाशी ( ११ ) । वाणी ( १२ ) । वाणीची ( १३ ) । वाणः ( १४ ) । पविः ( १५ ) । भारती ( १६ ) । धमनिः ( १७ ) । नालीः ( १८ ) । मेना ( १९ ) । मेलिः ( २० ) । सूर्या ( २१ ) । सरस्वती ( २२ ) । निवित् ( २३ ) । स्वाहा ( २४ ) । वग्नुः ( २५ ) । उपब्दिः ( २६ ) । मायुः ( २७ ) । काकुत् ( २८ ) । जिह्वा ( २९ ) । घोषः ( ३० ) । स्वरः ( ३१ ) । शब्दः ( ३२ ) । स्वनः ( ३३ ) । ऋक् ( ३४ ) । होत्रा ( ३५ ) । गीः ( ३६ ) । गाथा ( ३७ ) । गणः ( ३८ ) । धेना ( ३९ ) । ग्नाः ( ४० ) । विपा ( ४१ ) । नग्ना ( ४२ ) । कशा ( ४३ ) । धिषणा ( ४४ ) । नौः ( ४५ ) । अक्षरम् ( ४६ ) । मही ( ४७ ) । अदितिः ( ४८ ) । शची ( ४९ ) । वाक् ( ५० ) । अनुष्टुप् ( ५१ ) । धेनुः ( ५२ ) । वल्गुः ( ५३ ) । गल्हा ( ५४ ) । सरः ( ५५ ) । सुपर्णी ( ५६ ) बेकुरा ( ५७ ) । इति सप्तपञ्चाशद् वाङ्नामानि ॥ ११ ॥
१२० २ अ० ७ पा० १ ख० । (खण्ड १) [ निरु० ] वाङ्नामानि उत्तराणि सप्तपञ्चाशत् । ‘वाक्’ कस्मात् ? वचेः । तत्र ‘सरस्वती’-इत्यस्य नदीवद् देवतावच्च निगमा भवन्ति । तद्-यद्- देवता वद्-उपरिष्टात् तद् व्याख्यास्यामः । अथ- एतद्-नदीवत्-॥ १ ॥ अर्थ । प्रकृत मेघके नामोंसे आगे सत्तावन (५७) वाक्के नाम हैं। ‘वाक्’ शब्द किस धातुसे है ? ‘वच्’ ( अदा० प० ) धातुसे । उनमें ‘सरस्वती’ इस नामके नदीके समान और देवताके समान निगम (वर्णनवाले मन्त्र) हैं । सो-जो देवताके समान हैं, उसे सोलहवें या ग्यारहवे अध्याय, “पावका नः सरस्वती” ( ऋ० सं० १, १, ६, ३) मन्त्रमें व्याख्यान करेंगे । और जो यह नदीके समान हैं, [ उसकी व्याख्या की जातो है ] ॥ १ ॥ व्याख्या । मेघोंमें ही वाक् या शब्द अधिक होता है, इस कारण मेघ- नामोंके अनन्तर वाक्के नाम कहे जाते हैं । वे ‘श्लोक’ ‘धारा’ ‘इला’ इत्यादि हैं । श्रूयते इति श्लोकः । श्रवण किया जाता है,- इससे ‘श्लोक’ है । ध्रियते तं तम्-अर्थम्-अवधारयितुम्-इति धारा । अर्थात् उस उस अर्थके अवधारण ( निश्चय ) करनेको धारण की जाती है, इससे ‘धारा’ है। त तम् अर्थ प्रति ईष्टे-इति इडा । अर्थात् उस उस अर्थके प्रति समर्थ' है, इससे इडा और ड-ल के अभेदसे ‘इला’ है। इसी प्रकार अन्य शब्दोकी व्याख्या करना होगा ॥ १ ॥
हिन्दी निरुक्त । १२१ [ निघ० ] अर्णः ( १ ) । क्षोदः ( २ ) । सद्मः ( ३ ) । नभः ( ४ ) । अम्भः ( ५ ) । कबन्धम् (६) । सलिलम् ( ७ ) । वाः ( ८ ) । वनम् ( ६ ) । घृतम् ( १० ) । मधु ( ११ ) । पुरीषम् ( १२ ) । पिप्पलम् ( १३ ) । क्षीरम् ( १४ ) । विषम् ( १५ ) । रेतः ( १६ ) । कषः ( १७ ) । जन्म ( १८ ) । बुबूकम् ( १८ ) । बुसम् ( २० ) । तुग्र्या ( २१ ) । वुर्वुरम् ( २२ ) । सुक्षेम ( २३ ) । धरुणम् ( २४ ) । खिरा ( २५ ) । अररिन्दानि ( २६ ) । ध्वस्मन्वत् ( २७ ) । जामि ( २८ ) । आयुधानि ( २६ ) । क्षपः ( ३० ) । अहिः ( ३१ ) । अक्षरम् ( ३२ ) । स्रोतः ( ३३ ) । तृप्तिः ( ३४ ) । रसः ( ३५ ) । उदकम् ( ३६ ) । पयः ( ३७ ) । सरः ( ३८ ) । भेषजम् ( ३६ ) । सहः ( ४० ) । शवः ( ४१ ) । यह्वः ( ४२ ) । ओजः ( ४३ ) । सुखम् ( ४४ ) । क्षत्रम् ( ४५ ) । आवर्याः ( ४६ ) । शुभम् ( ४७ ) । यादुः ( ४८ ) । भूतम् ( ४६ ) । भुवनम् ( ५० ) । भविष्यत् ( ५१ ) । महत् ( ५२ ) । आपः ( ५३ ) । व्योम ( ५४ ) । यशः ( ५५ ) । महः ( ५६ ) । सणीकम् ( ५७ ) । स्वतीकम् ( ५८ ) । सतीनम् ( ५६ ) । गहनम् ( ६० ) । गभीरम् ( ६१ ) । १६
१२२ २ अ० ७ पा० १ ख० । गम्भीरम् (६२) । ईम् (६३) । अन्नम् (६४) । हविः (६५) । सद्म (६६) । सदनम् (६७) । ऋतम् (६८) । योनिः (६९) । ऋतस्य योनिः (७०) । सत्यम् (७१) । नीरम् (७२) । रयिः (७३) । सत् (७४) । पूर्णम् (७५) । सर्वम् (७६) । अक्षितम् (७७) । बर्हिः (७८) । नाम (७९) । सर्पिः (८०) । अपः (८१) । पवित्रम् (८२) । अमृतम् (८३) । इन्दुः (८४) । हेम (८५) । स्वः (८६) । सर्गाः (८७) । शम्बरम् (८८) । अम्बरम् (८९) । वपुः (९०) । अम्बु (९१) । तोयम् (९२) । तूयम् (९३) । कृपीटम् (९४) । शुक्रम् (९५) । तेजः (९६) । स्वधा (९७) । वारि (९८) । जलम् (९९) । जलाषम् (१००) । इदम् (१०१) । इति एकशतमुदकना- मानि ॥ १२ ॥ [ निघ० ] अवनयः (१) । यह्व्यः (२) । खाः (३) । सीराः (४) । स्रोत्याः (५) । एन्यः (६) । धुनयः (७) । रुजानाः (८) । वक्षणाः (९) । स्वादोः अर्णाः (१०) । रोध चक्राः (११) । हरितः (१२) । सरितः (१३) । अग्रुवः (१४) ।
नभन्यः (१५) । वध्वः (१६) । हिरण्यवर्णाः (१७) । रोहितः (१८) । सस्रुतः (१९) । अर्णाः (२०) । सिन्धवः (२१) । कुल्या (२२) । वर्य्यः (२३) । उर्व्यः (२४) । इरावत्यः (२५) । पार्वत्यः (२६) । स्रवन्त्यः (२७) । अर्जस्वत्यः (२८) । पयस्वत्यः (२९) । सरस्वत्यः (३०) । तरस्वत्यः (३१) । हरस्वत्यः (३२) । रोधस्वत्यः (३३) । भास्वत्यः (३४) । अजिराः (३५) । मातरः (३६) । नद्यः (३७) । इति सप्तत्रिंशत् नदीनामानि ॥ १३ ॥ (खण्ड २) [ निरु० ] “इ॒यं शुष्मे॑भि र्बिस॒खा इ॑वा रुज॒- त्सानु॑ गि॒रीणां त॑वि॒षेभि॑ रू॒र्मिभिः॑ । पा॒रा॒वत॒घ्नी मव॑से सु॒वृ॒क्तिभिः सर॑स्वती॒ मा वि॑वासेमधी॒तिभिः॑ ॥ “इयं” शुष्मैः शोषकैः । 'शुष्मम्'-[ऋ० स० ४, ८, ३०, २] इति बलनाम, शोषयति इति सतः । 'बिसम्' विस्यतेर्भेदनकर्मणः । वृद्धिकर्मणो वा । “सानु” समु- च्छ्रितं भवति । समुन्नद्धम्-इति वा । महद्भिः “ऊ- र्मिभिः” “पारावतघ्नीम्” पारावारघातिनीम् । 'पारं' परं भवति । 'अवारम्' अवरम् । अवनाय सुप्रवृ- त्ताभिः स्तुतिभिः “सरस्वतीम्” कर्मभिः परिचरेम ॥
१२४ २ अ० ९ पा० २ खं० । उदकनामानि उत्तराणि एकशतम् ( १०१ ) । 'उदकं' कस्मात् ? 'उनत्ति-इति' सतः । नदी-नामानि उत्तराणि सप्तत्रिंशत् ( ३७ ) । नद्यः कस्मात् ? नदना भवन्ति, शब्दवत्यः । बहुल- मासां नैघण्टुकं वृत्तम् । आश्चर्यमिव प्रधान्येन । तत्र-इतिहासमाचक्षते ।— विश्वामित्र ऋषिः सुदासः पैजवनस्य पुरोहितो बभूव । 'विश्वामित्रः' सर्वमित्रः । 'सर्वम्' संसृ- तम् । 'सुदाः' कल्याणदानः । 'पैजवनः' पिज- वनस्य पुत्रः । 'पिजवनः' पुनः स्पर्द्धनीयजवो वा । मिश्रीभावगति र्वा । स वित्तं गृहीत्वा विपाट् शुतुद्र्योः सम्भेदम्-आययौ । अनुययुः-इतरे । स विश्वामित्रो नदीस्तुष्टाव ।—'गाधा भवत'-इति । अपिद्विवत्, अपि बहुवत् । तद्-यद्-द्विवद्-उपरि- ष्टात् तद् व्याख्यास्यामः । अथ एतद्-बहुवत्-॥ २ ॥ अर्थ । ( खण्ड विषय-) 'सरस्वती' शब्दके नदी वाचकतामें उदाहरण मन्त्र । मन्त्रगत-शुष्म, बिस, सानु, पारावतघ्नो, ( व्याख्या प्रसक्त-) पार, अवार शब्दोंका निर्वचन । उदक-नामोंकी संख्या । 'उदक' शब्दका निर्वचन । नदी नामोंकी संख्या । 'नदी' शब्दका निर्व-