भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 278

११२ २ अ० ६ पा० ३ खं० । उभे मिलिते स्तौति—"समानबन्धू" समानबन्धने समानबन्धू च "अमृते" अमरण धर्माणी "अनूची" इतरेतरं संश्लिष्टे "द्यावा" द्यावी द्योतनशीले । वा द्यावा सह "आमिनाने" अन्योन्यस्य अध्यात्मं कुर्वाणे "चरतः" गच्छतः इत्यर्थः ॥ 'रुशत्' चमकीले 'वत्स' बछड़ेवाली स्वयम् 'रुशती' चमकती 'श्वेत्या' सफेद (उषा) आती है। और काली (रात्रि) इसके स्थानोंको छोड़ती जाती है। [मिलित स्तुति] दोनों [रात्रि और उषा] सूर्यरूप एक बन्धन या एक बन्धुवालीं, कभी नहीं मरनेवालीं, आपसमें मिली हुईं, एक दूसरीको अपनेमे करती हुईं चलती हैं ॥ "रुशद्वत्सा" नाम सूर्यरूप बछड़ेवाली । 'रुशत्' यह वर्ण (चमकीले रङ्ग) का नाम है। प्रकाश अर्थवाले 'रुच्' (भ्वा० आ०) धातुसे है। मन्त्रका देखनेवाला ऋषि उस सूर्यको इस (उषा) का वत्स कहता है। [क्योंकि-] बच्छा अपनी माँके साथ रहता है, वैसे ही यह भी उषाके साथ रहता है। इस साहचर्य्यकी समानतासे सूर्य उषाका वत्स है। अथवा जैसे बच्छा अपनी माँको ऊँधोसे दुग्धरूप रसको हर लेता है, वैसे ही यह सूर्य प्रभात (उषा) कालको ओसको अपनी किरणोंसे हर लेता है। इस रस-हरण क्रियाकी समानतासे सूर्य उषाका वत्स है। 'रुशती' चमकीली 'श्वेत्या' सफेद रंगवाली 'आगात्' आती है। 'श्वेत्या' शब्द वर्णार्थक 'श्वित्' (भ्वा० आ०) धातुसे है। कृष्णने इसके स्थानोंको छोड़ा या दिया। 'कृष्ण' नाम काले रंगवाली रात्रिका है। 'कृष्ण' शब्द 'कृष्' (दि० प०) धातुसे है। निकृष्ट-अधम