भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 279

हिन्दी निरुक्त । ११३ रंगका नाम है। [क्योंकि-वह स्वयम् अँधेरेका रंग और अन्य वस्तुओंकी प्रतीतिका विरोधी है। अब इस ऋचाके उत्तरार्द्धसे इन रात्रि और उषा दोनोंकी स्तुति करता है। "समान बन्धू" ये रात्रि और उषा दोनों एक बन्धनमें बंधी हुई हैं। क्योंकि रात्रि आदित्यके अस्त (छिपने) से बँधी हुई या मिली हुई है। और उषाः उसके उदयसे बंधी हुई है। "अनन्चे" दोनों आपसमें एक दूसरेसे मिली हुई। "द्यावा वर्ण, चरतः" दोनों रात्रि और उषा अपने अपने वर्णको प्रकाशित करती हुई साथ चलती हैं। अथवा द्युलोकके साथ स्पर्धा करती हुई दोनों चलती हैं ! 'द्यो' क्यों है ? द्योतन या प्रकाशनसे । 'द्युत' दीप्तौ (भ्वा० आ०) धातुसे है। "आमिनाने" आपसको आत्मा में (आपसमें) करनेवालीं ॥ 'उषस्' शब्दके अर्थ तत्त्वको निश्चय करानेके लिये ये दोनों मन्त्र आये थे, इनका वर्णन हो चुका। अब प्रस्तुत-विषय कहा जाता है :— 'उषा' के नामोंके पश्चात् अहन् (दिन) के बारह नाम हैं। 'अहन्' क्यों ? इसमें सब प्राणी कर्मोंको करते हैं। 'हृञ्' हरणे (भ्वा० उ०) धातुसे है। उस 'अहन्' शब्दका नैघण्टुक या गौण वृत्तिसे वैश्वानर देवताकी ऋचामें यह निपात या उपयोग है।—॥ ३॥ (खण्ड ४) (निरू०) "अहश्च कृष्णमहरर्जुनञ्च विवर्त्तेते रजसी वेद्याभिः । वैश्वानरो जायमानो न राजा वाति रञ्ज्योतिषाग्निस्तमांसि ॥