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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

११२ २ अ० ६ पा० ३ खं० । उभे मिलिते स्तौति—"समानबन्धू" समानबन्धने समानबन्धू च "अमृते" अमरण धर्माणी "अनूची" इतरेतरं संश्लिष्टे "द्यावा" द्यावी द्योतनशीले । वा द्यावा सह "आमिनाने" अन्योन्यस्य अध्यात्मं कुर्वाणे "चरतः" गच्छतः इत्यर्थः ॥ 'रुशत्' चमकीले 'वत्स' बछड़ेवाली स्वयम् 'रुशती' चमकती 'श्वेत्या' सफेद (उषा) आती है। और काली (रात्रि) इसके स्थानोंको छोड़ती जाती है। [मिलित स्तुति] दोनों [रात्रि और उषा] सूर्यरूप एक बन्धन या एक बन्धुवालीं, कभी नहीं मरनेवालीं, आपसमें मिली हुईं, एक दूसरीको अपनेमे करती हुईं चलती हैं ॥ "रुशद्वत्सा" नाम सूर्यरूप बछड़ेवाली । 'रुशत्' यह वर्ण (चमकीले रङ्ग) का नाम है। प्रकाश अर्थवाले 'रुच्' (भ्वा० आ०) धातुसे है। मन्त्रका देखनेवाला ऋषि उस सूर्यको इस (उषा) का वत्स कहता है। [क्योंकि-] बच्छा अपनी माँके साथ रहता है, वैसे ही यह भी उषाके साथ रहता है। इस साहचर्य्यकी समानतासे सूर्य उषाका वत्स है। अथवा जैसे बच्छा अपनी माँको ऊँधोसे दुग्धरूप रसको हर लेता है, वैसे ही यह सूर्य प्रभात (उषा) कालको ओसको अपनी किरणोंसे हर लेता है। इस रस-हरण क्रियाकी समानतासे सूर्य उषाका वत्स है। 'रुशती' चमकीली 'श्वेत्या' सफेद रंगवाली 'आगात्' आती है। 'श्वेत्या' शब्द वर्णार्थक 'श्वित्' (भ्वा० आ०) धातुसे है। कृष्णने इसके स्थानोंको छोड़ा या दिया। 'कृष्ण' नाम काले रंगवाली रात्रिका है। 'कृष्ण' शब्द 'कृष्' (दि० प०) धातुसे है। निकृष्ट-अधम

हिन्दी निरुक्त । ११३ रंगका नाम है। [क्योंकि-वह स्वयम् अँधेरेका रंग और अन्य वस्तुओंकी प्रतीतिका विरोधी है। अब इस ऋचाके उत्तरार्द्धसे इन रात्रि और उषा दोनोंकी स्तुति करता है। "समान बन्धू" ये रात्रि और उषा दोनों एक बन्धनमें बंधी हुई हैं। क्योंकि रात्रि आदित्यके अस्त (छिपने) से बँधी हुई या मिली हुई है। और उषाः उसके उदयसे बंधी हुई है। "अनन्चे" दोनों आपसमें एक दूसरेसे मिली हुई। "द्यावा वर्ण, चरतः" दोनों रात्रि और उषा अपने अपने वर्णको प्रकाशित करती हुई साथ चलती हैं। अथवा द्युलोकके साथ स्पर्धा करती हुई दोनों चलती हैं ! 'द्यो' क्यों है ? द्योतन या प्रकाशनसे । 'द्युत' दीप्तौ (भ्वा० आ०) धातुसे है। "आमिनाने" आपसको आत्मा में (आपसमें) करनेवालीं ॥ 'उषस्' शब्दके अर्थ तत्त्वको निश्चय करानेके लिये ये दोनों मन्त्र आये थे, इनका वर्णन हो चुका। अब प्रस्तुत-विषय कहा जाता है :— 'उषा' के नामोंके पश्चात् अहन् (दिन) के बारह नाम हैं। 'अहन्' क्यों ? इसमें सब प्राणी कर्मोंको करते हैं। 'हृञ्' हरणे (भ्वा० उ०) धातुसे है। उस 'अहन्' शब्दका नैघण्टुक या गौण वृत्तिसे वैश्वानर देवताकी ऋचामें यह निपात या उपयोग है।—॥ ३॥ (खण्ड ४) (निरू०) "अहश्च कृष्णमहरर्जुनञ्च विवर्त्तेते रजसी वेद्याभिः । वैश्वानरो जायमानो न राजा वाति रञ्ज्योतिषाग्निस्तमांसि ॥

११४ २ अ० ६ पा० ४ ख० । “अहश्च कृष्णं” रात्रिः, शुक्लं “च-अहः-अर्जुनं विवर्त्तेते रजसी” “वेद्याभिः” वेदितव्याभिः प्रवृत्तिभिः “वैश्वानरो जायमानः” इव उद्यन् आदित्यः सर्वेषां ज्योतिषां “राजा” अवाहन् “अग्निः ज्योतिषा तमांसि” ॥ [ निघ० ] अद्रिः ( १ )। ग्रावा ( २ )। गोत्रः ( ३ )। - वलः ( ४ )। अश्मः ( ५ )। पुरुभोजाः ( ६ )। वलिशानः ( ७ )। अश्मा ( ८ )। पर्वतः ( ६ )। गिरिः ( १० )। व्रजः ( ११ )। चरुः ( १२ )। वराहः ( १३ )। शम्बरः ( १४ )। रौहिणः ( १५ )। रैवतः ( १६ )। फलिगः ( १७ )। उपरः ( १८ )। उपलः ( १६ )। चमसः ( २० )। अहिः ( २१ )। अभ्रम् ( २२ )। वलाहकः ( २३ )। मेघः ( २४ )। दृतिः ( २५ )। ओदनः ( २६ )। वृषन्धिः ( २७ )। व्ववः ( २८ )। असुरः ( २६ )। कोशः ( ३० )। इति त्रिंशन्मेघनामानि ॥ १० ॥ ( निरु० ) मेघनामानि उत्तराणि त्रिंशत् । ‘मेघः’ कस्मात् ? मेहति इति सतः । आ ‘उपरः’ ‘उपलः’ इति-एताभ्यां साधारणानि पर्वतनामभिः । ‘उपरः’ ‘उपलः’-मेघो भवति । उपरमन्ते अस्मिन्-

हिन्दी निरुक्त । ११५ अभ्राणि । उपरता आपः-इति वा । तेषामेषा भवति ॥ ४ ॥ अर्थ । क्योंकि 'अहन्' शब्द रात्रि और दिन दोनोंका ही वाचक है, इससे सन्देहका स्थान है । इसका विभाग इस ऋचामें विशेषणके भेदसे दिखाया है । 'भारद्वाजस्य इयमर्षम् । त्रिष्टुप् । पृष्ठस्य षष्ठे अहनि आग्निमारुते शस्त्रे शस्यते ।' काला दिन (रात्रि) सुपेद दिन (दिन) दोनों बदलते रहते हैं-रात्रि बीतो दिन आया, दिन बीता रात आई । दोनों प्राणियोंकी अनन्त प्रवृत्तियोंसे (अथवा ज्योति (प्रकाश) से दिन, और अँधेरेसे रात्रि ।) “रजसी” रञ्जक या प्रीतिके देनेवाले है । “वैश्वानर” अग्नि “जायमान” उदय होते हुए ज्योतियोंके राजा सूर्यके समान अपने “ज्योतिष्” प्रकाशसे “तमांसि” अँधेरोंको “अवातिरत्” 'अवाहन्' दूर करता है । व्याख्या । इस ऋचामें एक ही 'अहन्' शब्द 'कृष्ण' विशेषण लगानेसे रात्रिका और अर्जुन (शुक्ल) विशेषण लगानेसे दिनका वाचक होता है । इसी रीतिसे सन्देहके स्थानमे विशेषण आदिके सम्बन्ध- से शब्दका विशेष अर्थ निर्णीत करना चाहिये । वेदितव्या । 'विदित' नाम जानी हुई वस्तुओंका कदाचित् अन्त हो सकता है, किन्तु जो वेदितव्या या अभी नहीं जानी गई हैं किन्तु जानने योग्य है (जानी जावेंगी) उनका अन्त नहीं हो

११६ २ अ० ६ पा० ५ खं० । सकता, अर्थात् कौन कह सकता है वे कितनो हैं, इसी प्रकार वेदि- तव्या नामसे मन्त्रमें अनन्त अर्थ लिया गया है । ( निरु० ) [ क्योंकि-मेघ रात्रि और दिनमें ही होते हैं, इससे उनके ] पश्चात् तीस मेघके नाम हैं । 'मेघ' शब्द किस निर्वचनसे है ? 'मेहति' सेचन करता है, इस कर्त्तृ वाच्य ( 'मिह' सेचने ) ( भ्वा० प० ) धातुसे है । मेघ नामोंमें 'उपर' उपल' इन दो नामोंसे पूर्व सब नाम पर्वतनामोके साथ साधारण हैं । अर्थात् मेघ और पर्वत दोनोंके नाम हैं । 'उपर' और 'उपल' मेघ होता है । क्योंकि इसमें अभ्र ( मेघ ) उपरत या आकर स्थित होते हैं । अथवा इसमें जल उपरत होते हैं । र और ल के अभेदसे 'उपर' शब्दसे ही ‘उपल’ शब्द बन जाता है । उन मेघोंकी 'उपर' शब्द वाच्यतामें विशेष लिङ्गको बतानेवाली यह ऋचा है—॥ ४ ॥ ( खण्ड ५ ) ( निरु० ) “देवा॒नां मा॒ने प्रथ॒मा अतिष्ठन् कृन्तत्रा॑देषामु॒परा॑ उ॒दाय॑न् । त्रय॑स्तपन्ति पृथि॒वी- मनू॑पा द्वौ बृ॒बूकं॑ वहतः पुरी॒षम् ॥ ‘ [ ऋ० स० ७, ७, १६, ३ ] “देवा॒नां” निर्माणे “प्रथ॒मा अतिष्ठन्” मा- ध्यमिका देवगणाः । ‘प्रथस’ इति मुख्यनाम । प्रतमो भवति । विकर्त्तनेन मेघानामुदकं जायते । “त्रय॑स्तपन्ति पृथिवीमनूपाः” पर्जन्यो वायु रा- दित्यः शीतोष्णवर्षैः ओषधीः पाचयन्ति ‘अनूपाः’ अनुवपन्ति लोकान् स्वेन स्वेन कर्मणा । त्रयमपि

[Header] हिन्दी निरुक्त। ११७

इतरः-'अनूपः' एतस्मादेव । अनूप्यते उदकेन । अपि वा 'अन्वाप्'-इति स्यात् यथा 'प्राक्' इति । तस्य 'अनूपः' इति स्यात् । यथा 'प्राचीनम्' इति । “द्वा ब्बूकं वहतः पुरीषम्” वाय्वादित्यौ उदकम् । 'ब्बूकम्' इति-उदकनाम । ब्रवीते र्वा शब्दकर्मणः । भ्रंशते र्वा । 'पुरीषं' पृणातेः, पूरयते र्वा ॥ ५ ॥ इति द्वितीयाध्यायस्य षष्ठः पादः ॥ २, ६ ॥ अर्थ । 'उपर' शब्दकी मेघवाचकतामें उदाहरण मन्त्र । उदाहरणमें आये हुए 'प्रथम' 'अनूप' 'ब्बूक' और 'पुरीष' शब्दका निर्वचन । “वसुक्रस्य इन्द्रपुत्रस्य इयमर्षम् । त्रिष्टुप् । महाव्रते मरुत्वतीये शस्यते ।” मन्त्रार्थ—प्रजापतिके द्वारा देवताओंके निर्माणमें मध्यम लोकके देवता ही प्रथम ( मुख्य ) हुए । [ क्योंकि-मेघके अभावमें वृष्टि नहीं हो सकती और वृष्टिके बिना जब जगत् नहीं रह सकता, इसीसे इन मध्यम देवताओंकी उत्कृष्टता है । ] इन मेघोंके कृन्तन कर्त्तन या छेदनसे उपर ( जल ) “उदायन्” आते हैं । तीन अनूप देवता पृथिवीको तपाते हैं । दो देवता पुरीष या तृप्तिके देनेवाले पुरीष ( जल ) को धारण करते हैं । भाष्यार्थ-[ १म पाद ] देवताओंके निर्माणमें माध्यमिक देवगण प्रथम स्थित हुए । प्रथम यह मुख्यका नाम है । [ क्योंकि ] वह प्रतम या प्रकृष्टतम ( उत्तम ) होता है । [ २य पाद्-] मेघोंके विकर्त्तन [ काटनेसे ] उदक ( जल ) होता है । [ ३य पाद् ] तीन अनूप

११८ २ अ० ६ पा० ५ खं० । पृथिवीको तपन करते हैं। अर्थात् पर्जन्य (मेघ) वायु (पवन) और आदित्य (सूर्य) शीत (ढंढक) उष्ण (गरमी) और वर्ष (वृष्टि) से ओषधियोंको पकाते हैं । अनूप। क्योंकि-वे अपने अपने कर्मसे लोकोंको समयके अनुसार अनुगृहीत करते हैं। यह दूसरा भी (देश विशेषका वाचक) 'अनूप' शब्द इसी अनु (उप०) पूर्वक 'डुवप्' बीजसन्ताने (भ्वा० उ०) धातुसे है। क्योंकि वह भी जलसे भरा जाता है। अथवा अनु (उप०) 'आप्' (स्वा० प०) धातुसे 'अन्वाप्' शब्द होगा। क्योंकि वह जलसे व्याप्त होता है। जैसे 'प्राच्' शब्द। उसका अनूप'यह शब्द बन जायगा। जैसे 'प्राचीन' यह। [४र्थ पाद] दो पुरीष बूबूकको धारण करते हैं। दो वायु और आदित्य। 'बूबूक' जल। 'बूबूक' यह जलका नाम है। शब्दार्थक 'ब्रूञ्' (अदा० उ०) धातुसे है। अथवा 'भ्रंश' अधःपतने (भ्वा० आ०) धातुसे हैं। [क्योंकि-वह मेघसे गिरता है।] 'पुरीष' शब्द 'पृ' पूरणे (क्र्यादि प०) धातुसे है। [क्योंकि-वह जलाशयोंको पूर्ण कर देता है।] अथवा तृप्त्यर्थक 'पूर' (चु० उ०) धातुसे बनता है [क्योंकि-वह प्राणियोंकी तृप्ति करता है।] इति हिन्दी-निरुक्ते द्वितीयाध्यायस्य षष्ठः पादः ॥२,६॥ ──────────────

हिन्दी निरुक्त । ११६ सप्तमः पादः । [ निघ० ] श्लोकः ( १ ) । धारा ( २ ) । इला ( ३ ) । गौः ( ४ ) । गौरी ( ५ ) । गान्धर्वी ( ६ ) । गभीरा ( ७ ) । गम्भीरा ( ८ ) । मन्द्रा ( ९ ) । मन्द्राजनी ( १० ) । वाशी ( ११ ) । वाणी ( १२ ) । वाणीची ( १३ ) । वाणः ( १४ ) । पविः ( १५ ) । भारती ( १६ ) । धमनिः ( १७ ) । नालीः ( १८ ) । मेना ( १९ ) । मेलिः ( २० ) । सूर्या ( २१ ) । सरस्वती ( २२ ) । निवित् ( २३ ) । स्वाहा ( २४ ) । वग्नुः ( २५ ) । उपब्दिः ( २६ ) । मायुः ( २७ ) । काकुत् ( २८ ) । जिह्वा ( २९ ) । घोषः ( ३० ) । स्वरः ( ३१ ) । शब्दः ( ३२ ) । स्वनः ( ३३ ) । ऋक् ( ३४ ) । होत्रा ( ३५ ) । गीः ( ३६ ) । गाथा ( ३७ ) । गणः ( ३८ ) । धेना ( ३९ ) । ग्नाः ( ४० ) । विपा ( ४१ ) । नग्ना ( ४२ ) । कशा ( ४३ ) । धिषणा ( ४४ ) । नौः ( ४५ ) । अक्षरम् ( ४६ ) । मही ( ४७ ) । अदितिः ( ४८ ) । शची ( ४९ ) । वाक् ( ५० ) । अनुष्टुप् ( ५१ ) । धेनुः ( ५२ ) । वल्गुः ( ५३ ) । गल्हा ( ५४ ) । सरः ( ५५ ) । सुपर्णी ( ५६ ) बेकुरा ( ५७ ) । इति सप्तपञ्चाशद् वाङ्नामानि ॥ ११ ॥

१२० २ अ० ७ पा० १ ख० । (खण्ड १) [ निरु० ] वाङ्नामानि उत्तराणि सप्तपञ्चाशत् । ‘वाक्’ कस्मात् ? वचेः । तत्र ‘सरस्वती’-इत्यस्य नदीवद् देवतावच्च निगमा भवन्ति । तद्-यद्- देवता वद्-उपरिष्टात् तद् व्याख्यास्यामः । अथ- एतद्-नदीवत्-॥ १ ॥ अर्थ । प्रकृत मेघके नामोंसे आगे सत्तावन (५७) वाक्‌के नाम हैं। ‘वाक्’ शब्द किस धातुसे है ? ‘वच्’ ( अदा० प० ) धातुसे । उनमें ‘सरस्वती’ इस नामके नदीके समान और देवताके समान निगम (वर्णनवाले मन्त्र) हैं । सो-जो देवताके समान हैं, उसे सोलहवें या ग्यारहवे अध्याय, “पावका नः सरस्वती” ( ऋ० सं० १, १, ६, ३) मन्त्रमें व्याख्यान करेंगे । और जो यह नदीके समान हैं, [ उसकी व्याख्या की जातो है ] ॥ १ ॥ व्याख्या । मेघोंमें ही वाक् या शब्द अधिक होता है, इस कारण मेघ- नामोंके अनन्तर वाक्‌के नाम कहे जाते हैं । वे ‘श्लोक’ ‘धारा’ ‘इला’ इत्यादि हैं । श्रूयते इति श्लोकः । श्रवण किया जाता है,- इससे ‘श्लोक’ है । ध्रियते तं तम्-अर्थम्-अवधारयितुम्-इति धारा । अर्थात् उस उस अर्थके अवधारण ( निश्चय ) करनेको धारण की जाती है, इससे ‘धारा’ है। त तम् अर्थ प्रति ईष्टे-इति इडा । अर्थात् उस उस अर्थके प्रति समर्थ' है, इससे इडा और ड-ल के अभेदसे ‘इला’ है। इसी प्रकार अन्य शब्दोकी व्याख्या करना होगा ॥ १ ॥

हिन्दी निरुक्त । १२१ [ निघ० ] अर्णः ( १ ) । क्षोदः ( २ ) । सद्मः ( ३ ) । नभः ( ४ ) । अम्भः ( ५ ) । कबन्धम् (६) । सलिलम् ( ७ ) । वाः ( ८ ) । वनम् ( ६ ) । घृतम् ( १० ) । मधु ( ११ ) । पुरीषम् ( १२ ) । पिप्पलम् ( १३ ) । क्षीरम् ( १४ ) । विषम् ( १५ ) । रेतः ( १६ ) । कषः ( १७ ) । जन्म ( १८ ) । बुबूकम् ( १८ ) । बुसम् ( २० ) । तुग्र्या ( २१ ) । वुर्वुरम् ( २२ ) । सुक्षेम ( २३ ) । धरुणम् ( २४ ) । खिरा ( २५ ) । अररिन्दानि ( २६ ) । ध्वस्मन्वत् ( २७ ) । जामि ( २८ ) । आयुधानि ( २६ ) । क्षपः ( ३० ) । अहिः ( ३१ ) । अक्षरम् ( ३२ ) । स्रोतः ( ३३ ) । तृप्तिः ( ३४ ) । रसः ( ३५ ) । उदकम् ( ३६ ) । पयः ( ३७ ) । सरः ( ३८ ) । भेषजम् ( ३६ ) । सहः ( ४० ) । शवः ( ४१ ) । यह्वः ( ४२ ) । ओजः ( ४३ ) । सुखम् ( ४४ ) । क्षत्रम् ( ४५ ) । आवर्याः ( ४६ ) । शुभम् ( ४७ ) । यादुः ( ४८ ) । भूतम् ( ४६ ) । भुवनम् ( ५० ) । भविष्यत् ( ५१ ) । महत् ( ५२ ) । आपः ( ५३ ) । व्योम ( ५४ ) । यशः ( ५५ ) । महः ( ५६ ) । सणीकम् ( ५७ ) । स्वतीकम् ( ५८ ) । सतीनम् ( ५६ ) । गहनम् ( ६० ) । गभीरम् ( ६१ ) । १६

१२२ २ अ० ७ पा० १ ख० । गम्भीरम् (६२) । ईम् (६३) । अन्नम् (६४) । हविः (६५) । सद्म (६६) । सदनम् (६७) । ऋतम् (६८) । योनिः (६९) । ऋतस्य योनिः (७०) । सत्यम् (७१) । नीरम् (७२) । रयिः (७३) । सत् (७४) । पूर्णम् (७५) । सर्वम् (७६) । अक्षितम् (७७) । बर्हिः (७८) । नाम (७९) । सर्पिः (८०) । अपः (८१) । पवित्रम् (८२) । अमृतम् (८३) । इन्दुः (८४) । हेम (८५) । स्वः (८६) । सर्गाः (८७) । शम्बरम् (८८) । अम्बरम् (८९) । वपुः (९०) । अम्बु (९१) । तोयम् (९२) । तूयम् (९३) । कृपीटम् (९४) । शुक्रम् (९५) । तेजः (९६) । स्वधा (९७) । वारि (९८) । जलम् (९९) । जलाषम् (१००) । इदम् (१०१) । इति एकशतमुदकना- मानि ॥ १२ ॥ [ निघ० ] अवनयः (१) । यह्व्यः (२) । खाः (३) । सीराः (४) । स्रोत्याः (५) । एन्यः (६) । धुनयः (७) । रुजानाः (८) । वक्षणाः (९) । स्वादोः अर्णाः (१०) । रोध चक्राः (११) । हरितः (१२) । सरितः (१३) । अग्रुवः (१४) ।

नभन्यः (१५) । वध्वः (१६) । हिरण्यवर्णाः (१७) । रोहितः (१८) । सस्रुतः (१९) । अर्णाः (२०) । सिन्धवः (२१) । कुल्या (२२) । वर्य्यः (२३) । उर्व्यः (२४) । इरावत्यः (२५) । पार्वत्यः (२६) । स्रवन्त्यः (२७) । अर्जस्वत्यः (२८) । पयस्वत्यः (२९) । सरस्वत्यः (३०) । तरस्वत्यः (३१) । हरस्वत्यः (३२) । रोधस्वत्यः (३३) । भास्वत्यः (३४) । अजिराः (३५) । मातरः (३६) । नद्यः (३७) । इति सप्तत्रिंशत् नदीनामानि ॥ १३ ॥ (खण्ड २) [ निरु० ] “इ॒यं शुष्मे॑भि र्बिस॒खा इ॑वा रुज॒- त्सानु॑ गि॒रीणां त॑वि॒षेभि॑ रू॒र्मिभिः॑ । पा॒रा॒वत॒घ्नी मव॑से सु॒वृ॒क्तिभिः सर॑स्वती॒ मा वि॑वासेमधी॒तिभिः॑ ॥ “इयं” शुष्मैः शोषकैः । 'शुष्मम्'-[ऋ० स० ४, ८, ३०, २] इति बलनाम, शोषयति इति सतः । 'बिसम्' विस्यतेर्भेदनकर्मणः । वृद्धिकर्मणो वा । “सानु” समु- च्छ्रितं भवति । समुन्नद्धम्-इति वा । महद्भिः “ऊ- र्मिभिः” “पारावतघ्नीम्” पारावारघातिनीम् । 'पारं' परं भवति । 'अवारम्' अवरम् । अवनाय सुप्रवृ- त्ताभिः स्तुतिभिः “सरस्वतीम्” कर्मभिः परिचरेम ॥

१२४ २ अ० ९ पा० २ खं० । उदकनामानि उत्तराणि एकशतम् ( १०१ ) । 'उदकं' कस्मात् ? 'उनत्ति-इति' सतः । नदी-नामानि उत्तराणि सप्तत्रिंशत् ( ३७ ) । नद्यः कस्मात् ? नदना भवन्ति, शब्दवत्यः । बहुल- मासां नैघण्टुकं वृत्तम् । आश्चर्यमिव प्रधान्येन । तत्र-इतिहासमाचक्षते ।— विश्वामित्र ऋषिः सुदासः पैजवनस्य पुरोहितो बभूव । 'विश्वामित्रः' सर्वमित्रः । 'सर्वम्' संसृ- तम् । 'सुदाः' कल्याणदानः । 'पैजवनः' पिज- वनस्य पुत्रः । 'पिजवनः' पुनः स्पर्द्धनीयजवो वा । मिश्रीभावगति र्वा । स वित्तं गृहीत्वा विपाट् शुतुद्र्योः सम्भेदम्-आययौ । अनुययुः-इतरे । स विश्वामित्रो नदीस्तुष्टाव ।—'गाधा भवत'-इति । अपिद्विवत्, अपि बहुवत् । तद्-यद्-द्विवद्-उपरि- ष्टात् तद् व्याख्यास्यामः । अथ एतद्-बहुवत्-॥ २ ॥ अर्थ । ( खण्ड विषय-) 'सरस्वती' शब्दके नदी वाचकतामें उदाहरण मन्त्र । मन्त्रगत-शुष्म, बिस, सानु, पारावतघ्नो, ( व्याख्या प्रसक्त-) पार, अवार शब्दोंका निर्वचन । उदक-नामोंकी संख्या । 'उदक' शब्दका निर्वचन । नदी नामोंकी संख्या । 'नदी' शब्दका निर्व-

चन। नदियोंके नैघण्टुक वृत्तके बाहुल्य, और प्राधान्य वृत्तके आश्चर्य्यरूपताका उल्लेख। नदियोंकी स्तुति यहाँ॥- “भारद्वाजस्य आर्षम्। जगती।” “इयं” सरस्वती “शुष्मेभिः” 'शोषकैः' बलिष्ठैः “तविषेभिः” 'महद्भिः' “ऊर्मिभिः” “गिरीणाम्” पर्वतानाम् “सानु” शिखरम् “बिसखाः” बिसखा- नकः “इव” “अरुजत्” अनादरेणैव भनक्तीत्यर्थः। वयं “पारावतघ्नीम्” 'पारावारघातिनीम्' • तां “सर- स्वतीम्” “अवसे” रक्षणाय “सुवृक्ताभिः” 'सुप्रवृत्ताभिः “धीतिभिः” “स्तुतिभिः” “ओविवासेम” 'परिचरेम'- इत्यर्थः॥ यह सरस्वती बलिष्ठ बड़ी बड़ी लहरियोंसे पर्वतोंके ऊँचे ऊँचे शिखरोंको बिस (कमलके नाल) को खोदनेवालेके समान अनादर- से ही भङ्ग कर देती है। हम इधर उधरके किनारोँको भेदन करने वाली उस सरस्वतीको अपनी रक्षाके अर्थ सुन्दर स्तुतियोंसे आराधन करें॥ “इयम्” यह शुष्मों शोषणों या बलिष्ठोसे। 'शुष्म' यह बल- का नाम है, शोषण करता है, इस कर्त्तृवाच्य 'शुष्' (चु० उ०) धातुसे है। 'बिस' यह भेदनार्थक 'बिस्' (दि० प०) धातुसे है। अथवा वृद्ध्यर्थकसे। 'सानु' जो बहुत ऊँचा हो। अथवा भले प्रकार प्रेरित होता है। महत् (बड़ी) ऊर्मियों (लहरियों) से। पारावतघ्नी नाम पार अवारको घात करने वाली को। 'पार' नाम पर उधरवाला है। 'अवार' नाम अवर इधरवाला। अवन

१२६ , अ० ३ पा० २ ख० । (रक्षा) के लिये। सुप्रवृत्त स्वर आदिकी उत्तमतासे युक्त स्तुतियोंसे सरस्वतीको 'परिचरेम' आराधन करें । वाक्के नामोंके अनन्तर एक सौ एक (१०१) जलके नाम हैं। 'उदक' शब्द किस धातुसे है? 'उनत्ति' गीला करता है, इस प्रकार कर्त्तृवाच्य 'उन्ही' क्लेदने (रुधा० उ०) धातुसे है। जल नामोंके पश्चात् सैंतीस (३७) नदीके नाम हैं। 'नदी' क्यों हैं? जिससे कि-नदना या शब्दवाली हैं। इसका नैघण्टुक गौण वृत्तान्त बहुत है। प्रधानता या मुख्यतासे आश्चर्य जैसा है। तहाँ इतिहास कहते हैं--विश्वामित्र ऋषि- सुदस् पैजवनका पुरोहित हुआ था। 'विश्वामित्र' जो सबका मित्र हो, अथवा जिसका सर्व मित्र हो। 'सर्व' नाम फैला हुआ। 'सुदस्' नाम कल्याण या शुभदानवाले का है। 'पैजवन' पिजवन- का पुत्र । 'पिजवन' नाम फिर स्पर्द्धा करने योग्य बेगवाला । अथवा मिलित गति अथवा अनेक प्रकारकी गतिवाला; वह विश्वामित्र धन लेकर विपाशा और शुतुद्रुके सङ्गममें आया। दूसरे (और) पीछे आये। उस विश्वामित्र ने नदियोंकी स्तुति की कि-तुम अल्प-जल हो जाओ। दोके समान भी और बहुतके समान भी नदियोंकी स्तुतिऐं हैं)। सो जो दोओकी जैसी हैं, आगे उसको व्याख्या करेंगे। और जो बहुतोंकी जैसी है वह यह है—॥ २ ॥ व्याख्या । प्रथम खण्डमें कहा गया था कि-मन्त्रोंमें 'सरस्वती' यह नाम नदीके लिये और देवताके लिये दोनों प्रकारसे आता है। यहाँ पर नदी सरस्वतीकी स्तुतिमें “इयं शुष्मेभिः” यह मन्त्र दिया है। बड़ी और बलवाली ऊर्मिभी-(लहरियों) से गिरि-शिखरोंको नदी ही भेदन कर सकती हैं। इससे इस मन्त्रमें सरस्वती पद

हिन्दी निरुक्त । १२७ नदीके लिये ही है, किन्तु देवताके लिये नहीं ।। यह यास्काचार्य- का अभिप्राय है। निगमोंके द्वारा शब्दोंके अर्थ इसी प्रकार- निर्धारित होते हैं। ॥ २ ॥ ( खण्ड ३ ) [ निरु० ] “रमध्वं मे वचसे सोम्याय ऋतावरी रुपमुहूर्त्त मेवैः । प्र सिन्धुमच्छा बृहती मनीषा वस्युरह्वे कुशिकस्य सूनुः ॥” [ ऋ० सं० ३, २, १२५ ] “उप” “रमध्वम्” “मे” “वचसे” “सोम्याय” सोमसम्पादिने । “ऋतावरीः” ऋतवत्यः । ‘ऋतम्’- इति उदक-नाम । प्रत्यृतं भवति । “मुहूर्त्तम्” “एवैः” । अयनैः, अवनैर्वा । “मुहूर्त्तः” मुहूर्त्तुः । ‘ऋतुः’ ऋतेर्गतिकर्मणः । ‘मुहुः’ मूढ इव कालः । यावत्-अभीक्ष्णञ्च-इति । ‘अभीक्ष्णम्’ अभिक्षणाद्- भवति । ‘क्षणः’ क्षणोतेः । प्रक्ष्णुतः कालः । ‘कालः’ कलयतेर्गतिकर्मणः । “प्र” अवगाहयामि “सिन्धुम्” । ‘बृहत्या’ महत्या । ‘मनीषया’ मनस ईषया । ‘स्तुत्या’ ‘प्रज्ञया वा’ । अवनाय “कुशिकस्य सूनुः” । कुशिको राजा बभूव । क्रोशतेः शब्दकर्मणः । क्रंशते र्वा स्यात् प्रकाशयतिकर्मणः । साधु विक्क्रोशयिता अर्थानाम् इति वा । नद्यः प्रत्यूचुः ॥ ३ ॥

१२८ २ अ० ७ प० ३ ख० । अर्थ । [ खण्ड विषय ] विश्वामित्र कृत मिलित नदियोंकी स्तुति, पुनः एक नदीकी स्तुति और अपने पिताके परिचय देनेका जनाने- वाला उदाहरण मन्त्र ! मन्त्रका भाष्य और तहाँ मन्त्रगत-सोम्य, ऋतावरी, मुहूर्त्त, मनीषा, कुशिक, और विग्रहप्रसक्त-ऋत, मुहुः, ऋतु, अभीक्ष्ण, क्षण, काल, शब्दोंका निर्वचन । नदियोंके प्रत्युत्तरका प्रस्ताव । “रमध्वं मे वचसः” इति त्रिष्टुभः एताः । हे “ऋतावरीः” । उदकवत्यो नद्यः । “मे” मम “सोम्याय” सोम सम्पादिने “वचसे” वचनाय;“एवैः” एभिः (उदकैः) “मुहूर्त्तम्” “उपरमध्वम्” मन्दवेगाः अल्पोदकाश्च भवत-इत्यभिप्रायः । [ एकां प्रति ] “कुशिकस्य सूनुः” पुत्रः अह विश्वामित्रः “अवस्युः” अवनम्-इच्छन् “सिन्धुम्” “अच्छा” अच्छ अच्छ “बृहती, मनीषा” बृहत्या मनः पूर्विकया स्तुत्या “प्र- अह्वे” प्राभिह्वयामि इत्यर्थः ॥ हे जलवाली नदिओं ! मेरे देवताओंको सोम दिलानेवाले वचन- के लिये (उसे सत्य करनेके अर्थ) इन अपने जलोंसे थोड़ी देर तक मन्दवेग और थोड़े-जलवाली हो जाओ । [ एक नदीके प्रति ] मैं कुशिकका पुत्र विश्वामित्र अपनी रक्षाकी इच्छा करता हुआ सिन्धु नदीको अच्छी और बड़ी स्तुतिसे आह्वान करता हूं ॥ मेरे वचनके लिये अनुकूल हो । “सोम्य” सोमके तैयार कराने वालेके लिये । “ऋतावरी” नाम ऋतवालीं । 'ऋत' यह जलका

१३० । २ अ० ७ पा० ४ ख० । “इन्द्र ऽअस्मान्-अरदद्-वज्र॒बाहुः”। ‘रदतिः’ खनतिकर्मा । “अपा॒हन्-वृ॒त्रं-परि॒धिं” “न॒दीनाम्” इति व्याख्यातम् । “देवोऽनयत् सविता सुपाणिः’ । कल्याणपाणिः । ‘पाणिः’ पणायतेः पूजाकर्मणः । प्रगृह्य पाणी देवान् पूजयन्ति । “तस्य वयं प्रसवे याम उर्वीः”। ‘उर्वीः’ ऊर्णोतेः । वृणोतेः-इति और्णवाभः । प्रत्याख्याय अनन्ततः आश्रुश्रुवुः ॥४॥ अर्थ । [खण्ड विषय-] नदियोंका प्रतिवचन, कि हम तुम्हारी प्रार्थना के स्वीकारमें स्वतन्त्र नहीं। पाणि, उर्वी शब्दोंका निर्वचन। सूक्तके अन्तमें ऋषिके वाञ्छितको पूरा करनेकी प्रतिज्ञाका उल्लेख। हे विश्वामित्र ! “वज्रबाहुः इन्द्रः अस्मान् अरदत्” अखनत् । “नदीनां परिधिं” निरोधकं “वृत्रं” मेघम् “अपाहन्” अपावधीत् । स एव “सविता” वर्षद्वारेण सर्वार्थ-प्रसविता “सुपाणिः” ‘कल्याणपाणिः’ समुद्रम् “अनयत्” “तस्य” इन्द्रस्य “प्रसवे” आदेशे वर्त्तमानाः ‘“उर्वीः” ऊर्णुवत्यः वयं “यामः” गच्छामः इत्यर्थः । हे विश्वामित्र ! वज्रको हाथमें रखनेवाले इन्द्रने हमें खोदा है। [क्योंकि-] नदियोंके रोकनेवाले मेघको उसने मारा, [जिसके हत होनेसे पानी पृथ्वी पर गिरे, और वे पृथ्वीको खोदते हुए नीचे

हिन्दी निरुक्त । १३१ नीचेको ओर चले, उन्हींके किये हुए खातोंसे हम जाती हैं।] इसो प्रकार कामोके देनेवाले सुन्दर-ह थवाले इन्द्र देव ने हमे समुद्र में पहुँचाया । अतः हम पृथ्‍वीको ढाँपती हुई उसकी आज्ञामें चलती हैं। हमारा वही ईश्वर है, वही हमें आज्ञा दे सकता है, किन्तु तुम नहीं, यह अभिप्राय है ॥ वज्रबाहु इन्द्रने हमको रदन किया । 'रद्' ( भ्वा० प०) धातु का खोदना अर्थ है। नदियोंके परिधि (रोकनेवाले) वृत्रको मारा । "नदी" शब्दका व्याख्यान [नदना या शब्दवती ] [ अ० २ पा० ७ खं० २] [ नद्यः कस्मात् ? नदना भवन्ति शब्दवत्यः ] किया जा चुका । 'सविता" कार्योंके दाता सुपाणि इन्द्रदेवने हमे पहुँचाया । 'सुपाणि' नाम कल्याण या मङ्गलकारी हाथवाले- का है । 'पाणि' शब्द पूजा अर्थमें 'पण' (भ्वादि आ०) धातुसे है । [ क्योकि ] पाणि ( हाथ ) जोड़ कर ही देवताओंको पूजते हैं। हम उर्वी या ढाँपनेवाली, उसके प्रसव ( आदेश ) में चलती हैं। 'उर्वी' शब्द 'ऊर्णुञ्' आच्छादने ( अदा० उ०) धातुसे है। 'वृञ्' वरणे ( स्वा० उ०) धातुसे है—यह और्णवाभ आचार्य मानते हैं । अस्वीकार कर अन्तमें नदियों ने स्वीकार किया ॥ ४ ॥ व्याख्या । नदियोंने जो विश्वामित्रकी प्रार्थनाका "इन्द्रो अस्मान्" इस मन्त्रमें प्रत्याख्यान किया है, उसमें नदियाँ अपने साथ शत्रुके मारने रूप इन्द्रके उपकारके बदलेमें उसके प्रति पूरी कृतज्ञता और वश्यता दिखा रही हैं। यह मनुष्योंके लिये उपादेय धर्म है ॥ ४ ॥ (खण्ड ५) [ निघ०] अत्यः ( १ )। हयः ( २ । अर्वा ( ३ )। वाजी ( ४ )। सप्तिः ( ५ )। वह्निः (६) ।

१३२ ¦ २ अ० ३ पा० ५ ख० । दधिक्राः (७) । दधिक्रावा (८) । एतग्वा (९) । एतेशः (१०) । पैद्वः (११) । दौर्गहः (१२) । औच्चैः श्रवसः (१३) । तार्क्ष्यः (१४) । आशुः (१५) । ब्रध्नः (१६) । अरुणः (१७) । सांश्वत्वः (१८) । अव्यथयः (१९) । श्येनासः (२०) । सुपर्णाः (२१) । पतङ्गाः (२२) । नरः (२३) । ह्दार्याणाम् (२४) । हंसासः (२५) । अश्वाः (२६) । इति षड् विंशतिरश्वनामानि ॥ १४ ॥ [ निरु० ] "आ ते कारो शृणवामा वचांसि ययाथ दूरादन सार्थेन । निते नंसै पीप्यिानावयोषा मर्यायेव कन्या शश्वचैते ॥” [ ऋ० सं० ३. २. १३. ५ ] “आ शृणवाम" "ते कारो !” वचनानि । याहि दूराद्-अनसा च “रथेन” च । “नि” नमाम “ते” पाय यमाना “इव-योषा" पुत्रम् । "मर्याय- इव कन्या" परिष्वजनाय निनंसै-इति वा । अश्व- नामानि-उत्तराणि षड् विंशतिः । तेषामष्टौ-उत्तराणि बहुवत् । 'अश्व' कस्मात् ? अश्नुते अध्वानम् । महाशनो भवति-इति वा । तत्र 'दधिक्रा'-इत्येतद्-'दधत् क्रामति'-इति वा ।