निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२६ , अ० ३ पा० २ ख० । (रक्षा) के लिये। सुप्रवृत्त स्वर आदिकी उत्तमतासे युक्त स्तुतियोंसे सरस्वतीको 'परिचरेम' आराधन करें । वाक्के नामोंके अनन्तर एक सौ एक (१०१) जलके नाम हैं। 'उदक' शब्द किस धातुसे है? 'उनत्ति' गीला करता है, इस प्रकार कर्त्तृवाच्य 'उन्ही' क्लेदने (रुधा० उ०) धातुसे है। जल नामोंके पश्चात् सैंतीस (३७) नदीके नाम हैं। 'नदी' क्यों हैं? जिससे कि-नदना या शब्दवाली हैं। इसका नैघण्टुक गौण वृत्तान्त बहुत है। प्रधानता या मुख्यतासे आश्चर्य जैसा है। तहाँ इतिहास कहते हैं--विश्वामित्र ऋषि- सुदस् पैजवनका पुरोहित हुआ था। 'विश्वामित्र' जो सबका मित्र हो, अथवा जिसका सर्व मित्र हो। 'सर्व' नाम फैला हुआ। 'सुदस्' नाम कल्याण या शुभदानवाले का है। 'पैजवन' पिजवन- का पुत्र । 'पिजवन' नाम फिर स्पर्द्धा करने योग्य बेगवाला । अथवा मिलित गति अथवा अनेक प्रकारकी गतिवाला; वह विश्वामित्र धन लेकर विपाशा और शुतुद्रुके सङ्गममें आया। दूसरे (और) पीछे आये। उस विश्वामित्र ने नदियोंकी स्तुति की कि-तुम अल्प-जल हो जाओ। दोके समान भी और बहुतके समान भी नदियोंकी स्तुतिऐं हैं)। सो जो दोओकी जैसी हैं, आगे उसको व्याख्या करेंगे। और जो बहुतोंकी जैसी है वह यह है—॥ २ ॥ व्याख्या । प्रथम खण्डमें कहा गया था कि-मन्त्रोंमें 'सरस्वती' यह नाम नदीके लिये और देवताके लिये दोनों प्रकारसे आता है। यहाँ पर नदी सरस्वतीकी स्तुतिमें “इयं शुष्मेभिः” यह मन्त्र दिया है। बड़ी और बलवाली ऊर्मिभी-(लहरियों) से गिरि-शिखरोंको नदी ही भेदन कर सकती हैं। इससे इस मन्त्रमें सरस्वती पद