निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 291, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंचन। नदियोंके नैघण्टुक वृत्तके बाहुल्य, और प्राधान्य वृत्तके आश्चर्य्यरूपताका उल्लेख। नदियोंकी स्तुति यहाँ॥- “भारद्वाजस्य आर्षम्। जगती।” “इयं” सरस्वती “शुष्मेभिः” 'शोषकैः' बलिष्ठैः “तविषेभिः” 'महद्भिः' “ऊर्मिभिः” “गिरीणाम्” पर्वतानाम् “सानु” शिखरम् “बिसखाः” बिसखा- नकः “इव” “अरुजत्” अनादरेणैव भनक्तीत्यर्थः। वयं “पारावतघ्नीम्” 'पारावारघातिनीम्' • तां “सर- स्वतीम्” “अवसे” रक्षणाय “सुवृक्ताभिः” 'सुप्रवृत्ताभिः “धीतिभिः” “स्तुतिभिः” “ओविवासेम” 'परिचरेम'- इत्यर्थः॥ यह सरस्वती बलिष्ठ बड़ी बड़ी लहरियोंसे पर्वतोंके ऊँचे ऊँचे शिखरोंको बिस (कमलके नाल) को खोदनेवालेके समान अनादर- से ही भङ्ग कर देती है। हम इधर उधरके किनारोँको भेदन करने वाली उस सरस्वतीको अपनी रक्षाके अर्थ सुन्दर स्तुतियोंसे आराधन करें॥ “इयम्” यह शुष्मों शोषणों या बलिष्ठोसे। 'शुष्म' यह बल- का नाम है, शोषण करता है, इस कर्त्तृवाच्य 'शुष्' (चु० उ०) धातुसे है। 'बिस' यह भेदनार्थक 'बिस्' (दि० प०) धातुसे है। अथवा वृद्ध्यर्थकसे। 'सानु' जो बहुत ऊँचा हो। अथवा भले प्रकार प्रेरित होता है। महत् (बड़ी) ऊर्मियों (लहरियों) से। पारावतघ्नी नाम पार अवारको घात करने वाली को। 'पार' नाम पर उधरवाला है। 'अवार' नाम अवर इधरवाला। अवन