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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

‘दधत्-क्रन्दति’-इति वा । दधत् आकारी भवति- इति वा । तस्य अश्ववद्-देवतावच्च निगमा भवन्ति । तद् यद् देवतावद्-उपरिष्टात् तद् व्याख्यास्यामः । अथ एतद् अश्ववत् ॥ ५ ॥ अर्थ । [ खण्ड विषय-] विश्वामित्रका प्रार्थनाके स्वीकार करनेमें नदि- योंका वचन = ‘आतेकारा” मन्त्र । अश्वना गोंका सख्या । अश्व, दधिक्राः, इन दो शब्दोंका निर्वचन । दधिक्रा शब्दके अश्व और देवता दोनोंके लिये मन्त्रोंमें आनेका उल्लेख । देवतार्थकके आगे व्याख्यान करनेका प्रतिज्ञा । अश्व अर्थमें यहीं उदाहरण देनेका प्रस्ताव” । हे “कारो !” स्तोत्राणां कर्त्तः ! “ते” तव “वचांसि” “आ” आभिमुख्येन वयं “शृणवाम” [ अतो ब्रूमः ] त्वं “ययाथ” याहि । कथम् ? “अनसा” शकटेन “रथेन” च सह । यतस्त्वं “दूरात्” आयातः परिश्रान्तश्च । तेन वयम्-एताः “ते” तुभ्यं पुत्रं “पीप्याना” पाययमाना” योषा- इव” “निनंसै” निनमाम । पुनश्च “मर्याय” मनु- ष्याय “शश्वचै” परिष्वजनाय “कन्या” नवोढा “इव” “ते” तुभ्यं निनमाम ।

१३६ | २ अ० ९ पा० ५ ख० । हे मन्त्र नम्रोंके करनेवाले ! तेरे वचनोंको हम सामनेसे सुनती हैं। इससे हम कहती हैं, कि तुम गाड़ी ओर रथ सहित चले आओ। क्योंकि तुम दूरसे आये और थके हुए हो। इसलिये ये हम तेरे लिये पुत्रको पिलानेवाली माताके समान और आलि- ङ्गन या लिपटानेके लिये पुरुषके अर्थ बौंदनीके समान झुकती हैं। हे कारो ! तेरे वचनोको आभिमुख्यसे सुनती हैं। जा। दूरसे गाड़ी से और रथसे। तेरे लिये झुकती हैं। पुत्रको पिलाने वाली स्त्रीके समान। अथवा लिपटानेके अर्थ पुरुषके लिये कन्या नयो ब्याही स्त्रीके समान हम झुकती हैं। प्रकृत नदीके नामोंके अनन्तर छब्बीस (२६) अश्वके नाम हैं। उनमें पिछले आठ (८) नाम बहु वचनान्त हैं। 'अश्व' क्यों? वह मागको अश्रुते या व्याप्त करता है। अथवा बहुत अशन या भोजन करनेवाला है। तहाँ 'दधिक्रा' यह नाम है। अश्वारोहको धारण करता हुआ चलना है। अथवा अश्वारोहको धारण करता हुआ क्रन्दन या शब्द करता है। अथवा अश्वारोहको धारण करता हुआ आकारवाला होता है। उसके अश्वके समान ओर देवताके समान निगम (मन्त्र) हैं। सो जो देवतामे समान है उसे आगे (दैव- तकाण्ड अ० १० में) व्याख्यान करेंगे। ओर यह अश्वके समान है।—॥ ५ ॥ व्याख्या । मनुष्यस्वभाव-जब मनुष्यको किसीकी प्रार्थना पूरी करना होता है, तो वह उसके सामने देख कर सुनता है, और जब उसे उसका कार्य नहीं करना है, तो सामने नही देखता, तथा सुनी अनसुनी कर देता है। जब कोई कहता है, मैंने सुना ! तो समझना चाहिये कि मेरी प्रार्थनाको पूरी करना चाहता है। ऐसा ही नदियोंने अब “आते” मन्त्रमे विश्वामित्रसे कहा है।

हिन्दी निरुक्त । | १३५ भर्म-दूरसे अपने पास आये हुआका अनुरोध (लिहाज) और शरणागतकी रक्षा। मन्त्रमे नदियोने विश्वामित्रसे ऐसा ही बर्त्ताव किया है। दधिक्राः । 'दधत्' शब्दके साथ पर्यायसे 'क्रम्'। (भ्वा० प०) 'क्रन्दू' (भ्वा० प०] धातु और आकार शब्दके मेलसे बनाया है। सवारके चढ़ जाने पर ही अश्वकी उदासीनता हटती है, और वह यथेष्ट गति, शब्द, और आकारको धारण करता है ॥ ५ ॥ (खण्ड ६) [ निघ० ] हरी इन्द्रस्य ( १ ) । रोहितः-अग्नेः ( २ ) । हरितः-आदित्यस्य ( ३ ) । रासभौ-अश्विनोः ( ४ ) । अजाः पूष्णः ( ५ ) । पृषत्यो मरुताम् ( ६ ) । अरुण्योगावः-उषसः ( ७ ) । श्यावाः सवितुः ( ८ ) । विश्वरूपाः बृहस्पतेः ( ६ ) । नियुतो वायोः ( १० ) । इति दश आदिष्टोपयोजनानि ॥ १५ ॥ वैदिक देवताओंके वाहन । अर्थः-हरे दो घोडे,-इन्द्रके (१) लाल घोडा,-अग्निका (२) हरे बहुत घोड़े, आदित्यके (३) । दो गधे,-दोनों अश्विनी- कुमारोंके (४) । बहुत बकरे पूषाके (५) । बहुत पृषती (गो या मृग-विशेष )-मरुतोंके (६) । लाल गौएं-उषाके (७)। श्याव या काले रङ्गको सविताके (८)। सब रङ्गवालीं बृहस्पतिके (६)। मिलीजुली गौएँ वायुके बाहन हैं। (१०) । दश 'हरी' आदि नाम विशेष विशेष देवताओंसे सम्बन्ध रखनेवाले हैं ॥ १५ ॥

५३६ २ अ० ७ पा० ६ ख० । [ निघ० ] भ्राजते ( १ ) । भाशते ( २ ) । भाश्यति ( ३ ) । दीदयति (४) । शोचयति ( ५ ) । मन्दते ( ६ ) । भन्दते ( ७ ) । रोचते ( ८ ) । द्योतते ( ९ ) । ज्योतते ( १० ) । द्युमत् ( ११ ) । इति एकादश ज्वलति कर्म्माणः ॥ १६ ॥ [ निघ० ] जमत् ( १ ) । कल्पलौकिनम् (२) । जञ्जणाभवन् ( ३ ) । मल्मलाभवन् ( ४ ) । अर्चिः ( ५ ) । शोचिः ( ६ ) । तपः ( ७ ) । तेजः ( ८ ) । हरः ( ९ ) । घृणिः ( १० ) । शृङ्गाणि ( ११ ) । शृङ्गाणि इति एकादश ज्वलतो नामधेयानि नाम- धेयानि ॥ १७ ॥ निघण्टुका खण्डसूत्र— “गौः ( १ ) हेम ( २ ) अम्बरम् ( ३ ) स्वः (४) खेद्यः ( ५ ) ज्ञाताः ( ६ ) । श्यावी ( ७ ) । विभा- वरी ( ८ ) वस्तोः ( ६ ) अद्भिः ( १० ) श्लोकः ( ११ ) अर्णः ( १२ ) अवनयः ( १३ ) अत्यः ( १४ ) हरौ इन्द्रस्य ( १५ ) भ्राजते ( १६ ) जमत् ( १७ ) इति सप्तदश ( १७ ) ॥” इति निघण्टौ प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

हिन्दी निरुक्त । १३७

[ निरु० ] "उतस्य वाजी क्षिपणिं तुर्र्यति । ग्रीवायां बद्धो अपिकक्ष आसनि । क्रतुं दधिक्रा अनुसन्तवीत्वत् पथामङ्कांस्यन्वापनीफणत् ॥" [ ऋ० सं० ३, ७, ४, ४ ] "अपि" स "वाजी" वेजनवान् क्षेपणमनु तूर्ण म- श्नुते अध्वानम्, “ग्रीवायां बद्धः ।” 'ग्रीवा' गिरते र्वा । गृणाते र्वा । गृह्णते र्वा । "अपिकक्ष-आसनि" इति व्याख्यातम् । "क्रतुं दधिक्राः" कर्म वा प्रज्ञां वा । "अनुसन्तवीत्वत् ।” तनोतेः पूर्वया प्रकृत्या निगमः । "पथामङ्कांसि ।” पथां कुटिलानि । 'पन्थाः' पतते र्वा । पद्यते र्वा । पन्थते र्वा । 'अङ्कः'-अञ्चतेः । "अपनी फणत्"-इति फणतेः-चर्करीतवृत्तम् । दशं- उत्तराण्यादिष्टोपयोजनानि-इति-आचक्षते-साहचर्य- ज्ञानाय । ज्वलतिकर्माणः उत्तरे-धातवः-एकादश । तावन्ति- एव उत्तराणि ज्वलतो नामधेयानि नाम- धेयानि ॥ ६ ॥ ( इति षष्ठः खण्डः ) सप्तमः पादः । द्वितीयोऽध्यायः समाप्तः ॥ २ ॥ १८

१३८ २ अ० ३ पा० ६ खं० । अर्थ । [ खण्ड विषय-] 'दधिक्रा' शब्दकी अश्ववाचकतामें उदाहरण मन्त्र । 'ग्रीवा' शब्दका निर्वचन । 'आसन्' शब्दके पूर्व किये हुए निर्वचनका स्मरण । 'अनुसन्तवीत्वत्' पदकी प्रकृति । 'पथिन्' और 'अङ्क' शब्दका निर्वचन । 'अपनीफणत्' पदकी प्रकृति और वृत्ति । प्रयोजन सहित आदिष्टोपयोजन नामोंकी संख्या । ज्वलति- कर्मा धातुओं और ज्वलत्के नामोंकी संख्या ॥' “उतस्य वाजी-इति गोतमपुत्रस्य वामदेवस्य द्वयमार्षम् । जगती । वाजपेये वाजियुक्तं रथमारुह्य यजमानोऽनुवाकं जपति, तवैषा ।” “उतस्यः” अपि सः “वाजी” वेजनवान् ‘ओविजी’ भयचलनयोः ( रु० प० )-( तु० आ० ) भयवान् परेभ्यो भयदाता, “ग्रीवायां बद्धे आसनि” मुखे च “बद्धः अपि” “दधिक्राः” अश्वः “क्षिपणिं” कशा- घातम् अनु [ अनाहतोऽपिवा ] “तुरण्यति” तूर्ण म- श्नुते अध्वानम्, “ऋतुम्” आत्मीयं गमनं कर्म अथवा अश्वारोहस्य प्रज्ञाम् “अनुसन्तवीत्वत्” अनुसन्तनोति, “पथां” मार्गाणाम् “अङ्कांसि” कुटिलानि अनुलोमानि इव कुर्वन् “आपनीफणत्” आभिमुख्येन पुनः पुनः भृशं वा फणति गच्छति-इत्यर्थः ॥

हिन्दी निरुक्त । १३६ वह 'वाजी' शत्रुओंको डरानेवाला गर्दनमे बाघीसे, छातीमे कक्ष्या या तङ्गसे और मुखमें खलीन या लगामसे बँधा हुआ होने पर भी घोड़ा कोड़ेके लगते ही, या लगनेसे पहिले ही शीघ्र मार्गको व्याप्त कर लेता है [ जब कि दूसरा प्राणी एक स्थानमें भी बँधा हुआ चल भो नहीं सकता, शीघ्र चलना तो कहाँ । ] अपने गमन- रूप कर्मको अथवा अपने सवारकी बुद्धिको विस्तृत [ क्योंकि- शीघ्र चलनेके कारण स्वामीके वाञ्छितको सिद्ध करता है । ] ओर मार्गकी जो कुटिलता या टेढ़ापन है, उसे अपनी शीघ्रगतिके प्रभावसे सरल करता हुआ बार बार या अति गमन करता है ॥ इस मन्त्रमें दधिक्राके वर्णनमे जो विशेषण दिये हैं, वे सब अश्वमें ही घटते है, इस लिये यह 'दधिक्रा' के अश्ववचनतामें प्रमाण है । वेदके समयमे जो घोड़ेकी तैयारीमें सभ्यता थी, वह अब तक भी उसी रूपमें है, कोई परिवर्त्तन नहीं हुआ है । वह वाजी वेजनवान् या भयवान् कोड़ेके साथ ही शीघ्र मार्गको व्याप्त करता है । ग्रीवामें बँधा हुआ । 'ग्रीवा' शब्द निगलने अर्थमें 'गृ' ( तु० प० ) धातुसे है । क्योंकि—उससे अन्नको निगलता है । अथवा शब्द अर्थ में 'गृ' ( क्रया० प० ) धातुसे है । क्योंकि—उससे शब्द करता है । अथवा ग्रहण अर्थमे 'ग्रह' ( क्रया० उ० ) धातुसे है । क्योंकि—उससे जल आदिको ग्रहण करता है । अथवा वह जत्रोऽसे बाँधी जाती है । कक्ष ( छाती ) में और आसन् ( मुख ) में । 'आसन्' शब्दकी व्याख्या [ ] हो चुकी । “ऋतु' दधिक्राः” 'ऋतु' कर्म या प्रज्ञाको । 'दधिक्रा' अश्व । “अनु सन्तवीत्वत्” 'तनु' विस्तारे ( त० उ० ) धातुकी पहिली प्रकृतिके निगम है ।

१४० २ अ० ६२ पा० ख० । “प्रकृत्यन्तः सनन्तश्च यङन्तो यङ्लुगेव च । रायन्तो रायन्तसनन्तश्च षड्विधो धातुरुच्यते ॥” अर्थ:—प्रकृत्यन्त, सनन्त, यङन्त, यङ्लुक्, रायन्त, और रायन्त सनन्त छः प्रकारका धातु होता है । ‘पथित्’ शब्द ‘पत्लृ’ पतने (भ्वा० प०), ‘पद’ गतौ (दि० आ०) और ‘पथि’ गतौ (चु० प०) धातुसे है । ‘अङ्क’ शब्द ‘अञ्चु’ गतिपूजनयोः (भ्वा० प०) धातुसे है । ‘अपनीफणत्’ यह क्रिया पद ‘फण’ गतौ (भ्वा० प०) यङ्लुगन्त धातुसे है । अश्वोंके नामोंके अनन्तर दश (१०) आदिष्टोपयोजन हैं ऐसा आचार्य कहते हैं । यद्यपि ये अश्वोंके ही नाम हैं, इससे इन्हें पूर्वोक्त अश्व नामोंके साथ मिला कर ही कहना चाहिये था, तथापि ये नाम विशेष विशेष देवताओंके सम्बन्धसे ही मन्त्रोंमें आते हैं, इस लिये उन देवताओंके साहचर्य या सम्बन्धके दिखानेके लिये अलग पढ़े गये हैं । आदिष्टोपयोजन नामोंके पश्चात् ‘ज्वलति’ (जलता है) के अर्थमे ग्यारह (११) धातु हैं । उतने ही उनके आगे ज्वलत् पर जलता हुआके नाम है ॥ ६ ॥ व्याख्या । ज्वलितकर्मा । क्योकि-जो ही अश्ववाले होते हैं, वे ही तेजसे जलते हुए जैसे होते हैं, इसीसे अश्वनामोंके अनन्तर ज्वलित अर्थ- वाले धातु कहे हैं ॥ ६ ॥ निरुक्तके द्वितीय-अध्यायका खण्डसूत्र—

हिन्दी निरुक्त । १४१ [ १म पाद् ] ' अथ निर्वचनम् (अर्थाप्यस्तैः ) (१) ओघः (शवभिः) (कक्ष्या-सामान्यादश्वस्य) (विष्व- कद्राकर्षः ) ( २ ) राज्ञः ( ३ ) विद्याह वै ( ४ ) [ द्वि० पा० ] अथातोऽनुक्रमिष्यामः ( ५ ) वृक्षे वृक्षे ( ६ ) ता वां वास्तूनि ( ७ ) य ईं चकार ( ८ ) अयं स शिङ्क्ते ( ८ ) [ तृ० पा० ] हिरण्यनामानि ( १० ) आर्ष्टिषेणः ( ११ ) [४र्थ पा०] यद्देवापिः (१२) साधारणानि ( १३ ) स्वरादित्यः (१४ ) [ ५म पा० ] रश्मिनामानि ( १५ ) अतिष्ठन्तीनां ( १६ ) दासपत्नीः ( १७ ) [ ६ष्ठ पा० ] रात्रिनामानि ( १८ ) इदं श्रेष्ठं ( १८ ) रुशद्वत्सा ( २० ) अहश्च कृष्णम् ( २१ ) देवानां माने ( २२ ) [ ७म पा०] वाङ्नामानि ( २३ ) इयं शुष्मेभिः ( २४ ) रमध्वं मे ( २५ ) इन्द्रो अ- स्मान् ( २६ ) आ ते कारो ( २७ ) उतस्यः ( २८ ) अष्टाविंशतिः ( २८ ) ॥ इति निरुक्ते पूर्वषट्के द्वितीयोऽध्यायः समाप्तः ॥ २, ७॥

१४२ २ अ० ७ पा० ६ खं० । ऊपर दिये हुए खण्डसूत्रके अनुसार इस द्वितीय अध्यायमें आरम्भसे अन्त तक निरुक्तके पाठमें खण्ड आये हैं। उन्हींके स्मरणार्थ यह खण्डसूत्र है। जहां आदर्श पुस्तकमें एक खण्डमें दो खण्ड या अन्यथा किया गया है, वहां मूल खण्ड प्रतीकके साथ द्वयर्धचन्द्र-( ) चिन्हके भीतर नवीन पाठ-विभाग दे दिया गया है। पादोंका आरम्भ और खण्डोंकी संख्या भी यथास्थान उक्त चिन्हमें दी गई है। इति हिन्दीनिरुक्ते पूर्वषट्के द्वितीयोऽध्यायः समाप्तः ॥ २, ७ ॥

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॥ श्रीः ॥ हिन्दी-निरुक्त । अथ तृतीयाध्याय । ( १ म पादः ) अथ निघण्टौ द्वितीयोऽध्यायः १ [ निघ० ] अपः ( १ ) । अप्नः ( २ ) । दंसः ( ३ ) । वेषः ( ४ ) । वेपः ( ५ ) । विष्ट्वी ( ६ ) । ब्रतम् ( ७ ) । कर्वरम् ( ८ ) । शक्म ( ९ ) । क्रतु ( १० ) । करणम् ( ११ ) । करणानि ( १२ ) । करांसि ( १३ ) । करन्ती ( १४ ) । करिक्रत् ( १५ । चक्रत् ( १६ ) । कर्त्वस् ( १७ ) । कर्त्तोः ( १८ ) । कर्त्तवैः ( १८ ) । कृत्वी ( २० ) । धीः ( २१ ) । शची ( २२ ) । शमी ( २३ ) । शिमी ( २३ ) । शक्तिः ( २५ ) । शिल्पम् ( २६ ) । इति षड्विंशतिः कर्म नामानि ॥ १ ॥ [ निघ० ] तुक् ( १ ) । तोकम् ( २ ) । तनयः ( ३ ) । तोक्म ( ४ ) । तक्म ( ५ ) । शेषः ( ६ ) ।

२ ३ अ० १ पा० १ खंड । अप्नः (७)। गयः (८)। जाः (८)। अपत्यम् (१०)। यहुः (११)। सूनुः (१२)। नपात् (१३)। प्रजा (१४) बीजम् (१५)]। इति पञ्चदश अपत्य नामानि ॥ २ ॥ (खण्ड १) [निरुक्तम्] ओ३म् । कर्मनामानि उत्तराणि षड्विंशतिः। कर्म कस्मात् ? क्रियते-इति सतः। अपत्यनामानि उत्तराणि पञ्चदश। अपत्यं कस्मात् ? अपततं भवति। न अनेन पतति इति वा। तद्-यथा जनयितुः प्रजा-एवमर्थीये ऋचा उदाहरिष्यामः ॥ १ ॥ अर्थ। ज्वलत्के नामोंके पीछे छब्बीस (२६) कर्मके नाम हैं। [क्योंकि कर्मोंको करता हुआ ही तेजसे जलता है अथवा चमकता है, इसीसे ज्वलत्के नामोंके पश्चात् कर्म कहे गये हैं।] 'कर्म' शब्द किस धातुसे है? 'क्रियते' किया जाता है ऐसे कर्मवाच्य 'कृञ्' (त० उ०) धातुसे है। प्रकृत कर्म नामोंके पीछे पन्द्रह (१५) अपत्यके नाम हैं। [क्योंकि सब कर्मों में पितृऋणके दूर करनेके द्वारा अपत्य या सन्तानका उत्पन्न करना ही प्रधान कर्म है, इससे, कर्मनामोंके पश्चात् अपत्य-नाम कहे गये हैं।]

हिन्दी निरुक्त । ३ 'अपत्य' क्यों है ? अप-तत अर्थात् पितासे आकर अलग जैसा विस्तृत होता है। अथवा इसके उत्पन्न हुए हुए होनेसे पितर नरकमे नहीं गिरते हैं [ इससे अपत्य है । ] [ धर्मके जाननेवाले पुरुष विवाद करते हैं कि दोनोंके सन्निपात या उपस्थितिमें क्या क्षेत्रवालेका अपत्य है या बीज वालेका ? सो यह कहा जाता है कि ] 'जिस प्रकार उत्पन्न-करनेवाले या बीजवालेका ही अपत्य या प्रजा है इस प्रकारकी व्यवस्थामें दो ऋचाए उदाहरण करते हैं । ( खण्ड २ ) “परिषद्यं ह्यररणस्य रेक्णो नित्यस्त एयः पतयः स्याम। न शेषो अग्ने अन्यजात मस्त्यचेतानस्य मा पथो विदुक्षः ॥” [ ऋ० सं० ५, २, ६, २ ] [ भा० ] परिहर्त्तव्यम् हि न उपसत्तव्यम्, अरणस्य रेक्णाः । अरणः, अपार्णो भवति । 'रेक्णः, इति धननाम । रिच्यते प्रयतः । नित्यस्यरायः पतयः स्याम ।” पित्र्यस्य इव धनस्य । “न शेषो अग्ने अन्यजात मस्तिः ।” 'शेषः' इति अपत्यनाम । शिष्यते प्रयतः । अचेतयमानस्य तत् प्रमत्तस्य भवति । “मा” नः “पथो” “वि” दुदुषः-इति । तस्य उत्तरो भूयसे निर्वचनाय ॥ २ ॥

४ ३ अ० १ पा० २ खं० । अर्थ । “परिषद्यं हि” न हि ग्रभाय “इति च ( २, ३ खं० ) एते त्रिष्टुभौ ।” वसिष्ठ और अग्निके संवादमे हतपुत्र वसिष्ठने अग्निसे प्रार्थना की कि 'मुझे पुत्र दे' । अग्निने वसिष्ठसे कहा कि-क्रीतक (खरीदा हुआ) कृत्रिम (बनावटी) और दत्तक (गोदका) आदि पुत्र बहुत हैं, उनमेंसे कोई पुत्र कर सकते हो । इस प्रकार अग्निसे उत्तर पाकर वसिष्ठने दो ऋचाओंसे (अन्यजात (औरसे उत्पन्न) पुत्रोंकी निन्दा करते हुए औरस (जो अपने वीर्यसे अपनी पत्नीमें उत्पन्न होता है) पुत्र माँगा । 'हि' यतः 'अरणस्य' अपगतोदकसम्बन्धस्य पर- कुलजातस्य 'रिक्थः' यद्-अपत्याख्यं धनम् तत्- 'परिषद्यम्' परिहर्त्तव्यम् न पुत्रत्वेन परिकल्पयित- व्यमित्यर्थः । यतः एवम् अतो ब्रूमः-'नित्यस्य' 'रायः' अपत्याख्यस्य धनस्य 'पतयः' स्वामिनः 'स्याम' भवेम । हे 'अग्ने ।' 'न' 'शेषः' अपत्यम् 'अन्य- जातम्-अस्ति' । 'अचेतांस्य' धर्मान् अश्रु तवत एव तद् भवति । तस्मात् 'पथः' सन्मार्गात् अस्मान् मा कथञ्चित् 'विदुक्षः' विदूदूषः प्रच्योवय इत्यर्थः । त्वं देहि नः पुत्रम्-औरसम्-इत्यभिप्रायः । जिससे कि-उसका अपत्य (पुत्र) रूप धन जिसके साथ अपना जलका सम्बन्ध नहीं अर्थात् दूसरे कुलमें पैदा हुआ है,

त्याज्य या पुत्र-भावसे मानने योग्य नहीं हैं। इस कारण कहते हैं कि-इस नित्य (जो सदा हमारे सङ्ग रहे) पुत्ररूप धनके पति या स्वामी होवें। हे अग्नि देव ! दूसरेसे उत्पन्न हुआ अपत्य नहीं होता। अर्थात् जो ही उसे उत्पन्न करता है, उसीका वह होता किन्तु दूसरेका नहीं। अनजानको ही वह सन्तोष मात्र है, कि- यह मेरा अपत्य है पर वास्तवमे वह अपत्यका काम नहीं देता। अतः हम कहते हैं कि-हमें हमारे बाप दादोंकी मर्यादासे मत गिराओ। प्रयोजन यह कि-हमें औरस पुत्र दो। [ निरुक्तार्थ ] [ १ म पा० ] क्योंकि अरण या जलके सम्बन्धसे रहित पुरुषका रेक्ण या अपत्यधन छोड़ने योग्य है,या पास जाने योग्य नहीं है। 'अरण' नाम अपार्णका है, अर्थात् जिसके साथ जलका सम्बन्ध नहीं। 'रेक्ण' नाम धनका है। क्योंकि वह इस लोकसे परलोकको जाते हुए या मरते हुएका यहीं रह जाता है, या उससे वह खाली हो जाता है। [ द्वि० पा० ] हम 'नित्य' जो अपने संगको कभी न छोड़े, धनके पति होवें। जैसे कि बापके धनका स्वामी बेटा हो जाता है। [ तृ० पा० ] हे अग्निदेव ! दूसरेसे उत्पन्न हुआ 'शेष' नहीं है। 'शेष' यह नाम अपत्यका है। क्योंकि मरते हुएका वह शेष (बचा हुआ) रह जाता है। [ च० पा० ] 'अचेतयमान' या प्रमादीका वह होता है। हमें उस मार्गसे मत अलग करो। इसी अपत्य शब्दके निर्वचनके प्रसङ्गमें इस मन्त्रकी व्याख्या की गयी है, और आगेका मन्त्र प्रसक्तानुप्रसक्त ही कहा गया है, इसी अभिप्रायसे आचार्य कहते हैं—"तस्य उत्तरा भूयसे निर्वचनाय।" अर्थात् उसी मन्त्रकी पर्याप्त (काफी) व्याख्याके लिये अगली ऋचा है ॥२॥

६ ३ अ० १ पा० २ खं० । व्याख्या। यद्यपि “परिषद्यं हि” यह ऋचा ‘अपत्य’ शब्दके निर्वचनमें किसी अर्थको पुष्ट नहीं करती, इससे इसे यहां न पढ़ना चाहिये था। [ व्याकरणके समान निरुक्तमें भी शब्दोंका ही अनुशासन है, अतः शब्द ही उसके विषय हैं, उनके व्याख्यानमें उनके अर्थको पुष्ट करनेके लिये जो मन्त्र रखा जाता है वह वहाँ निगम नामसे बोला जाता है और आवश्यक होता है, किन्तु यह ऋचा उस कार्यको नहीं करती । ] तथापि ‘अपत्य शब्दके अर्थ अपत्य या पुत्रके सम्बन्धकी एक ऐसी मार्मिक बातको यह ऋचा कहती है, जो अपुत्र मनुष्य पुत्रकी लालसा रूप अग्निको बुझानेके अर्थ दत्तक- कृत्रिम आदि पुत्र करते हैं, उन्हें याद रखने और विद्वानोंको हृदयङ्गम करने योग्य है, ऐसा जान कर आचार्यने इसे यहाँ रख दिया है। इसके अतिरिक्त यह भी इस ऋचाके द्वारा आचार्यने दिखाया कि, जिस प्रकार स्मृतियोंमें धर्मके अनेक रहस्य विस्तारसे दिखाये हैं, उसी प्रकार वेदमें भी वैसे ही रहस्य विस्तार पूर्वक हैं। वसिष्ठजी इस मन्त्रमें अपने देवतासे दो प्रार्थनाएं (दरखास्तें) करते हैं (क) हम नित्य (अपत्य) धनके पति हों। (ख) हमे सच्चे मार्गसे भुलावा न दें। इन प्रार्थनाओंके ठहरानेमें तीन कारण दिखाये हैं (क) असम्बन्धीका (अपत्य) धन परित्याज्य है (ख) हे अग्ने ! अन्यजात अपत्य (पुत्र) नहीं होता। (ग) किन्तु वह अचेतान (अनजान) को होता है। अरण या अपगतोदक-सम्बन्ध ।— “सपिण्डता तु पुरुषे सप्तमे विनिवर्त्तते । समानोदक-भावस्तु जन्मनाम्नो खेदने ॥” [ मनु० ५, ६० ]

हिन्दी निरुक्त । ७ अर्थात्-सातवें पुरुष या पीढ़ीमे सापिण्ड्य पूरा हो जाता है, और 'हमारे कुलमे अमुक नामका पुरुष हुआ'- इस प्रकार जन्म और नामके परिज्ञान न रहनेसे समानका सम्बन्ध छूट जाता है ॥ २ ॥ (खण्ड ३) [ निरु० ] “न हि ग्रभायारणः सुशेवोऽन्योदर्यो मनसा मन्तवा उ । ऊधा चिदोकः पुनरित्स एत्यानो वाज्यभीषाले तु नव्यः ॥” [ ऋ० सं० ५, २, ६, ३ ] 'न हि' ग्रहीतव्यः 'अरणः' सुसुखतमोऽपि । 'अन्योदर्यो मनसाऽपि न मन्तव्यो-मम-अयम्-पुत्रः- इति । अथ 'सः' 'ओकः' 'पुनः' एव तद् 'एति' यतः आगतो भवति । 'ओकः' इति निवास नाम उच्यते । 'एतु' 'नो' 'वाजी' वेजनवान् अभिषह माणः सपत्नान् नवजातः स एव पुत्रः इति । अथ एतां दुहितृदायाद्ये उदाहरन्ति पुत्र- दायाद्ये-इत्येके ॥-॥ ३ ॥ अर्थ । [ सं० मन्त्रार्थः ] “सुशेवः” 'सुसुखतमः' परि- चारकः हितैषी अपि “अरणः” अपगतोदकसम्बन्धः पुत्रः “नहि ग्रभाय” 'नहि ग्रहीतव्यः' “अन्योदर्यो मनसा” 'अपि' “न” “मन्तवै ( उ )” 'मन्तव्यः'।

८ ३ अ० १ पा० ३ खं० । “अधः” अथ अतः “सः” तद् “ओकः” स्वं निवास स्थानं स्वं वंशं वा “पुनः-इत्” ‘पुनरेव’ “एति” ‘आगतो भवति’ । यतः एवम्-अतो ब्रवीमि ‘स एव’ “नव्यः” ‘नवजातः पुत्रः’ य “वाजी” ‘वेजनवान्’ परेभ्यो भयदाता “अभीषाट्” अभि- षहमाणः’ अभिभवन् सपत्नान् “नः” अस्माकम् “ऐतु” आगच्छतु न परकीयः पुत्रः सङ्कल्पितः इत्यर्थः । चाहे बहुत सुखका देनेवाला, सेवा करनेवाला और हितका चाहनेवाला भी क्यों न हो, परन्तु जिसके साथ जलका सम्बन्ध न हो उसे पुत्र कभी न बनाना चाहिये; तथा “अन्योदर्य” दूसरेके डाले हुए वीर्य्यसे उत्पन्न हुआ या दूसरेकी पत्नीके पेटसे उत्पन्न हुआ मनसे भी सङ्कल्प न करना चाहिये कि-यह मेरा पुत्र है । क्योंकि फिर भी वह अपने उस पुराने घर या वंशमे आ जाता है । जिससे कि-ऐसा है, इससे मैं कहता हूं कि-वह नव्य नवजात (नया पैदा हुआ) पुत्र जो शत्रुअ का भय देनेवाला और उन्हे तिरस्कार करने वाला हमें पुत्र मिले, अर्थात् दूसरेका पुत्र हमारा सङ्कल्पित या वाञ्छित नहीं है । (नि० अ० ) नहीं ही लेना चाहिये, जिसके साथ जलका सम्बन्ध नहीं, चाहे बहुत सुखदायी भी हो । दूसरेके पेटसे उत्पन्न हुआ (पुत्र) मनसे भी न मानना चाहिये कि-यह मेरा है। क्योंकि वह उस स्थानको फिर भी आ जाता है, जहाँसे वह आया हुआ होता है। ‘ओकस्’ यह निवासका नाम कहा जाता है। मिले