भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 300, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 300

हिन्दी निरुक्त । | १३५ भर्म-दूरसे अपने पास आये हुआका अनुरोध (लिहाज) और शरणागतकी रक्षा। मन्त्रमे नदियोने विश्वामित्रसे ऐसा ही बर्त्ताव किया है। दधिक्राः । 'दधत्' शब्दके साथ पर्यायसे 'क्रम्'। (भ्वा० प०) 'क्रन्दू' (भ्वा० प०] धातु और आकार शब्दके मेलसे बनाया है। सवारके चढ़ जाने पर ही अश्वकी उदासीनता हटती है, और वह यथेष्ट गति, शब्द, और आकारको धारण करता है ॥ ५ ॥ (खण्ड ६) [ निघ० ] हरी इन्द्रस्य ( १ ) । रोहितः-अग्नेः ( २ ) । हरितः-आदित्यस्य ( ३ ) । रासभौ-अश्विनोः ( ४ ) । अजाः पूष्णः ( ५ ) । पृषत्यो मरुताम् ( ६ ) । अरुण्योगावः-उषसः ( ७ ) । श्यावाः सवितुः ( ८ ) । विश्वरूपाः बृहस्पतेः ( ६ ) । नियुतो वायोः ( १० ) । इति दश आदिष्टोपयोजनानि ॥ १५ ॥ वैदिक देवताओंके वाहन । अर्थः-हरे दो घोडे,-इन्द्रके (१) लाल घोडा,-अग्निका (२) हरे बहुत घोड़े, आदित्यके (३) । दो गधे,-दोनों अश्विनी- कुमारोंके (४) । बहुत बकरे पूषाके (५) । बहुत पृषती (गो या मृग-विशेष )-मरुतोंके (६) । लाल गौएं-उषाके (७)। श्याव या काले रङ्गको सविताके (८)। सब रङ्गवालीं बृहस्पतिके (६)। मिलीजुली गौएँ वायुके बाहन हैं। (१०) । दश 'हरी' आदि नाम विशेष विशेष देवताओंसे सम्बन्ध रखनेवाले हैं ॥ १५ ॥