निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३६ | २ अ० ९ पा० ५ ख० । हे मन्त्र नम्रोंके करनेवाले ! तेरे वचनोंको हम सामनेसे सुनती हैं। इससे हम कहती हैं, कि तुम गाड़ी ओर रथ सहित चले आओ। क्योंकि तुम दूरसे आये और थके हुए हो। इसलिये ये हम तेरे लिये पुत्रको पिलानेवाली माताके समान और आलि- ङ्गन या लिपटानेके लिये पुरुषके अर्थ बौंदनीके समान झुकती हैं। हे कारो ! तेरे वचनोको आभिमुख्यसे सुनती हैं। जा। दूरसे गाड़ी से और रथसे। तेरे लिये झुकती हैं। पुत्रको पिलाने वाली स्त्रीके समान। अथवा लिपटानेके अर्थ पुरुषके लिये कन्या नयो ब्याही स्त्रीके समान हम झुकती हैं। प्रकृत नदीके नामोंके अनन्तर छब्बीस (२६) अश्वके नाम हैं। उनमें पिछले आठ (८) नाम बहु वचनान्त हैं। 'अश्व' क्यों? वह मागको अश्रुते या व्याप्त करता है। अथवा बहुत अशन या भोजन करनेवाला है। तहाँ 'दधिक्रा' यह नाम है। अश्वारोहको धारण करता हुआ चलना है। अथवा अश्वारोहको धारण करता हुआ क्रन्दन या शब्द करता है। अथवा अश्वारोहको धारण करता हुआ आकारवाला होता है। उसके अश्वके समान ओर देवताके समान निगम (मन्त्र) हैं। सो जो देवतामे समान है उसे आगे (दैव- तकाण्ड अ० १० में) व्याख्यान करेंगे। ओर यह अश्वके समान है।—॥ ५ ॥ व्याख्या । मनुष्यस्वभाव-जब मनुष्यको किसीकी प्रार्थना पूरी करना होता है, तो वह उसके सामने देख कर सुनता है, और जब उसे उसका कार्य नहीं करना है, तो सामने नही देखता, तथा सुनी अनसुनी कर देता है। जब कोई कहता है, मैंने सुना ! तो समझना चाहिये कि मेरी प्रार्थनाको पूरी करना चाहता है। ऐसा ही नदियोंने अब “आते” मन्त्रमे विश्वामित्रसे कहा है।