भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 276, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 276

११० २ अ० ६ पा० ३ खं० । ऋचा है । [ रात्रिका अन्तिम भाग 'उषा' कहलाता है'—इसी अर्थकी दृढ़ताके लिये यह और ऋचा है ।] ॥ २ ॥ व्याख्या । ‘इदं चित्रम्’ इस ऋचामें योनि शब्द स्थानके लिये आया है । ‘यु’ मिश्रणे ( अदा० प० ) धातुसे है । युत होनेसे वह योनि है । क्योंकि-जो जिसमें होता है वह उससे युत या मिला हुआ ही होता है, इस न्यायसे रात्रिमें उषा होती है, इससे वह उसके साथ युत या मिली हुई है, और इससे उषाकी योनि रात्रि है । यास्क मुनि कहते हैं कि—लोकमे ‘योनि’ शब्दसे स्त्री-योनि ली जाती है, वह भी इसी धातुसे है, क्योंकि-उसके साथ भी गर्भ मिला हुआ रहता है । यास्काचार्यके मतमें ‘योनि’ शब्द पुंलिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग दोनों प्रकारका है । यह उनके प्रयोगसे सिद्ध है ॥ २ ॥ ( खण्ड ३ ) ( निघ० ) वस्तोः ( १ ) । द्यौः ( २ ) । भानुः ( ३ ) । वासरम् ( ४ ) । स्वसराणि ( ५ ) । घंसः ( ६ ) । घर्मः ( ७ ) । द्युक्षः ( ८ ) । दिनम् ( ९ ) । दिवा ( १० ) । दिवे दिवे ( ११ ) । द्यवि द्यवि ( १२ ) । इति द्वादशाह्नामानि ॥ ६ ॥ [ निरु० ] “रुशद्वत्सा रुशती श्वेत्यागादा- रैगु कृष्णा सदनान्यस्याः । समानबन्धू अमृते अनूची १द्यावावर्णं चरत आमिनाने ॥ १ ‘द्यावा’ पद प्रथमा-विभक्तिके द्विवचन और, तृतीया विभक्तिके एक वचनमें होता है ।