निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 275, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । १०६ ‘आदित्यस्य’ “सवाय” ‘प्रसवाय’ आदित्योत्सृष्टे देशे जायते “एवा एवम् “रात्री” “उषसे” “यो- निम्” ‘स्थानम्’ “आरिचत्” आरेचयति-ददाति- इत्यर्थः ॥ “इदं श्रेष्ठम्” इति आङ्गिरसस्य कुत्सस्य इयम्-आर्षम्, उत्तरा च । उभे अपि त्रिष्टुभौ एते । प्रातरनुवाकाश्विनयोः शस्येते । आदित्य आदि ज्योतियोंमें, अति शीत अति उष्ण (गरम) न होनेके कारण श्रेष्ठ यह उषा रूप ज्योति आता है। अपनी श्रेष्ठता- से ही पूजनीय अति प्रसिद्ध और अन्य छोटे ज्योतियोंकी अपेक्षा- अधिक व्यापक है। जिस प्रकार जनती हुई रात्रि आदित्यको जननेके लिये उसके स्थानसे दूसरे स्थानमें हो जाती है, उसी प्रकार उषाके लिये भी स्थान देती है। जिस प्रकार उषा आदित्यके जन्मका कारण है, क्योंकि-वह उस (उषा) के अनन्तर ही होता है, उसी प्रकार रात्रि उषाका हेतु है। इस रीतिसे ‘इस ऋचामें रात्रिका अपर (पिछला) भाग ही ‘उषा हुआ।’ यह प्रतीत होता है। यह ज्योतियोंमें श्रेष्ठ (उत्तम) ज्योति (उषा) आती है। चित्र या पूजनीय, प्रकेतन नाम बहुत प्रसिद्ध और अधिक व्यापक हुआ। जैसे प्रसव या जननेवाली रात्रि सूर्यके प्रसव (जनने) के लिये है, उसी प्रकार रात्रि उषाके लिये स्थान देती है। [यह भी दूसरी] स्त्रीकी योनि [इसी धातुसे है] क्योंकि-गर्भ इसके साथ मिला हुआ रहता है। उसी उषाके लिये यह दूसरी और