निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । २१ शार्वरेण तमसा दिग्धानि सर्वद्रव्याणि प्रकाशोदकेन धौतानिव करोतीत्यर्थः ॥ भाई बिना की कन्या जिस प्रकार पिताकी दी हुई होकर भी, और पतिकी स्वीकारकी हुई होकर भी, सन्तान कर्म पिण्डदानके लिये अपने बापके वंशमें ही आ जाती है। किन्तु पतिके घरमें नहीं, उसी प्रकार उषा रात्रिके पिछले पहरमें आकाशमें चढ़ जाती है। जिस प्रकार कोई दाक्षिणात्या (दक्षिण देशकी) स्त्री, जो पति और पुत्रसे हीन है, धनकी प्राप्तिके लिये गर्त या सभास्थाणु (चबूतरा या तख्त) पर चढ़ जाती है, उसी प्रकार उषा आकाशमें चढ़ जाती है। जिस प्रकार काम-युक्त नारी ऋतुकालमें सुन्दर वस्त्र धारण कर पतिको अपना रूप दिखाती है, उसी प्रकार उषा भी मनुष्योंको अपना रूप दिखाती है। और जिस प्रकार हास्य स्वभाववाली कोई स्त्री हँस कर अपने दाँतोंको दिखाती है, उसी प्रकार उषा अपने भीतर छुपे हुए सब द्रव्योंके रूपोंको दिखाती है। नि० अ०—जिस प्रकार भाई बिनाकी स्त्री सन्तान कर्म पिण्डदानके लिये अपने पिताके वंशके सम्मुख आती है, किन्तु पतिके घर नहीं। जैसे दक्षिण देशकी (पति-पुत्र-विहीन) स्त्री धनके लाभार्थ गर्त पर चढ़ती है। 'गर्त' नाम सभास्थाणु (पासे डालनेके तख्त) का है। 'गृ' निगरणे (क्र्या० प०) धातुसे है। क्योंकि वह सत्यसङ्गर होता है। अर्थात् प्राय करके उस पर कितव या जुआरिये 'सत्य-यह यहाँ पर गिरा है, यह नही गिरा',—इस प्रकार सत्य शब्दको बहुत बोलते हैं। जो झूठके लिये होता है, इसीसे वह सत्यसङ्गर और गर्त है। वहाँ उसे वह स्त्री आरोहण करती है, जो पति और पुत्रसे रहित है। उस स्त्रीको वहाँ अक्षों या पासोंसे ताड़न करते है (और) वह पतिके भागको प्राप्त होती है।