निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२ ३ अ० १ पा० ५ खं० । [ गर्त्त के प्रसङ्ग से ] श्मशान सञ्चय या मुरदे जलानेकी चबूतरी भी 'गर्त्त' कहाती है। 'गुरी' उद्यमने (तु० आ०) धातुसे है। क्योंकि—वह अपगूर्ण या लोकके विनाशके अर्थ उद्यत जैसा होता है। अर्थात् वहाँ पर जो पिशाच आदि भूत रहते हैं, वे मनुष्योंकी मृत्युको माँगते रहते हैं, और उनके मरने पर प्रसन्न होते हैं। [ व्याख्यानके प्रसङ्गसे ] 'श्मशान' श्मशयनसे है। क्योंकि— वहाँ 'श्म' शयन करता है। क्योंकि वह मरे हुएका वहाँ पर फेंक दिया जाता है। 'श्म' नाम शरीरका है। 'शरीर' 'शॄ' हिंसायाम् (क्र्या० प०) धातुसे है। 'श्मश्रु' नाम लोम (रोम) का है। क्योंकि वह 'श्म' (शरीर) में आश्रित रहता है। 'लोम' शब्द 'लूञ्' छेदने (क्र्या० उ०) धातुसे है। अथवा 'लीङ्' श्लेषणे (दि० आ०) धातुसे है। [क्योंकि—वह छेदन किया जाता है, अथवा शरीरमें लगा हुआ रहता है।] [ गर्त्त शब्दकी श्मशान वाचकता पर निगम ] "ऊपरको न उघाड़ना चाहिये, यदि ऊपरको उघाड़े, तो यजमान श्मशानमें सोवे, या मर जावे।" यह भी निगम है। [अपि शब्दसे और निगमोंकी सम्भावना भी दिलाते हैं।] रथ भी 'गर्त्त' कहलाता है। स्तुति-अर्थमें 'गृ' (क्र्या० प०) धातुसे है। क्योंकि वह और यानोंसे सुखदायी यान (सवारी) है, अतः अधिक प्रशंसा योग्य है। [ रथ अर्थमें निगम ] “आरोहथो मित्र" इत्यादि । "हे मित्र ! हे वरुण ! तुम दोनों गर्त्त या रथ पर चढ़े हुए हो।" यह भी निगम है। जिस प्रकार ऋतुकालमें कामयुक्त स्त्री सुन्दर वस्त्र धारण कर पतिको रूप दिखाती है। जिस प्रकार हसना स्त्री दाँतोंको