भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 332

२४ ३ अ० १ पा० ५ ख० । अभ्रातृमतोवादके अनुसार "शासदद्वन्हिः" इसके पूर्वार्द्ध का अर्थ :- उसी अभ्रातृमती कन्याका जो पुत्र है, उसीको पुत्रिका विधानके द्वारा अपना अभिनिवेश या अभिमान कर लेनेसे अपुत्र नाना अपना पौत्र मानता है। किन्तु अन्य भाईवाली कन्याओंके पुत्रोंको नहीं। ऐसा न माननेसे सभी विवाहने वाले अपुत्र होंगे, तथा उससे विवाहका परिश्रम व्यर्थ ही होगा। और पुत्रिकाके पिताकी भी भार्या दूसरेकी कन्या है, इससे उसमें भी जो कन्या होगी, वह नाना ही की होगी किन्तु दूसरे पुत्रिका पिताकी नहीं। यह सब बात अनिष्ट है। इस कारण जोही कन्या अभिनिवेश पूर्वक पुत्रिका की जाती है, उसीका पुत्र मातामहका होता है सब कन्याओंका नहीं। और वह दायकी स्वामिनी होती है किन्तु भ्रातृमती नहीं। इसीलिये "पिता यत्र" इत्यादि उत्तरार्द्ध कहा है। पुत्रिका—जो अपुत्र पिता अपनी कन्याको इसलिये दूसरेको देता है कि—उसके पुत्रको वह ले लेगा, वह कन्या पुत्रिका कहलाती है। अभ्रातृकाके पुत्र नानाके मुख्य पौत्र हैं और भ्रातृमती कन्याके भी पुत्र कहीं लोक और वेदमें नानाके पौत्र कहे जाते हैं, किन्तु वे गौणपौत्र हैं और अपने पिताके मुख्य पुत्र हैं। जबकि अभ्रातृका कन्याका पिता उसका पुत्रिका धर्मसे विवाह कर दे और बादमें उसके पुत्र हो जावें तो धनके विभाग कालमें ज्येष्ठ भ्राताका जो भाग है वह उस पुत्रिकाको मिलेगा और सब पुत्रोंको यथा भाग धन मिलेगा। किन्तु और सब कन्याएँ भाग रहित ही होती हैं। सोही इस अगली ऋचासे कहा जाता है, जिस प्रकार कि-अन्य कन्याओंका भाग नहीं है।