निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें“गर्तारुक्—इव” इसके निरुक्तसे प्रतीत होता है कि यास्क- मुनिके समयमे दक्षिण देशमें पुत्र विहीन विधवा स्त्रीकी उसे उसके पतिके धन मिलनेके अर्थ इस प्रकारकी कोई परीक्षा होती हो और उसके द्वारा उसके पातिव्रत्यका निर्णय माना जाता हो। ऐसे सन्दिग्ध अर्थोंके निर्णयके लिये धर्म-शास्त्रमें अनेक परीक्षाएँ विधान भी की हैं। भगवद्दुर्गाचार्य और सायणाचार्यने अक्षोंसे ताडनका कोई प्रयोजन स्पष्ट नहीं किया है। यास्कने गर्त्तको सभास्थाणु, भगवद्दुर्गने अक्षनिर्वपण स्थान और सायणने गृह तथा औचित्यसे न्यायालय बताया है। हमारी समझमें जुआरिणी स्त्री-सामान्य लेनेसे भी मन्त्रकी उपमा भले प्रकार बन सकती है। वह जिस प्रकार धनके लोभसे द्यूतके पीठपर चढ़ जाती है, उसी प्रकार उषा भी आकाशमें चढ़ जाती है॥ उपर। यज्ञमें जो वृक्षसे यूप बनता है, उसका पाँचवाँ भाग लम्बाईका बिना छिला या छिलके सहित छोड़ दिया जाता है, और उसे गाड़ देने पर वह गढ़े से जिसमें वह खड़ा होता है बाहर रह जाता है पर उसे कुश या मृत्तिकासे ढाँप दिया जाता है। यदि वह उघाड़ा रह जावे तो यजमानकी मृत्युका कारण बनता है। इसी प्रयोजनको “नोपरस्याविष्कुर्यात्” यह श्रुति कहती है। (ख० ६) [निरु०] “न जामये तान्वो रिक्थमारैक् चकार गर्भं सनितुर्निधानम् । यदी मातरो जनयन्त वह्नि मन्यः कर्त्ता सुकृतोरन्य ऋन्धन्” “न जामये” भगिन्यै । ‘जामिः’ अन्ये अस्यां जनयन्ति । “जामपत्यम् जमतेर्वा स्याद्गतिकर्मणः । ४