भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 335, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 335

हिन्दी निरुक्त । २७ आत्मज या पुत्र बहिनको भाग नहीं देता । किन्तु उसके भर्त्ताके लिये उसे गर्भ धारण करनेमें समर्थ बना देता है। माताएँ जो पुत्र और पुत्रको जनती हैं, जो कि-एकसे यत्नसे पैदा किये जाते हैं उनमेंसे एक सन्तानका और दूसरी भगिनी बढ़ाकर दूसरेको दे दी जाती है ॥ नि० अ०—"जामि" भगिनीके लिये नहीं। 'जामि' क्यो ? जिससे कि-इसमें दूसरे अपत्यको उत्पन्न करते हैं। 'जाम्' नाम अपत्यका है। गति अर्थमें 'जम्' (भ्वा० प०) धातुसे है। क्योंकि- वह प्राप्त करके गई हुई होती है। "तान्व" नाम आत्मज अपनेसे उत्पन्न पुत्रका है। "रिक्थ" भागको देता है। इसे हाथके पक- ड़ने वालेके अर्थ गर्भके योग्य बना देता है। माताएँ जो वह्नि या पुत्र और अवह्नि या स्त्रीको जनती हैं। उनमेंसे एक पुरुष सन्ता- नका करनेवाला और दाय (धन) का लेने वाला होता है। और दूसरा भगिनीरूप अपत्य बढ़ा कर दूसरेको दे दिया जाता है ॥३,१ ॥ व्याख्या । "नं जामये" मन्त्रसे दो बातें निकलती है कि-भाईको बहिनका दान-मानसे पोषण करना चाहिये, और वही (भाई) बापके धनका स्वामी है किन्तु कन्या नहीं। यद्यपि दोनोंकी उत्पत्ति समान यत्नसे ही होती है तथापि पुत्रसे बापका वंश बढ़ता है और कन्या दूसरेको दे दी जाती है, इसीसे वह बापके धनकी भागिनी नहीं बनती। धर्मशास्त्रमें जो गोत्र और सापिण्ड्यको त्याग कर कन्याका देना लिखा है, उसका मूल यह मन्त्र भी हो सकता है। पहिले यह कहा गया है कि पुरुषके भी दान, अतिसर्ग और विक्रय होते है सो वह कदाचित् किसी निमित्तसे होते हैं, और