भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 338

३० ३ अ० २ पा० १ खं० । अर्थ । प्रकृत अपत्य नामोंसे आगे पञ्चीस (२५) मनुष्यके नाम हैं। 'मनुष्य' क्यों ? (क) ज्ञान कर कर्मोंको करते हैं। (ख) हर्ष युक्त होते हुए प्रजापतिने इन्हें रचा है। 'मनस्य' धातु (नामधातु) मनस्वीभाव अर्थमे है। [मनस्वोभाव नाम हर्षयुक्त होनेका है।] (ग) मनुका अपत्य। (घ) अथवा मनुषका अपत्य है। तहाँ (मनुष्यनामोंमें) 'पञ्चजन' इस नामके निगम बहुत हैं ॥ १ ॥ व्याख्या । अपत्य नामोंके अनन्तर मनुष्य नामोंके कहनेका यह प्रयोजन है कि अपत्य ही बढ़ कर मनुष्य कहलाते हैं। मनुष्यके नामोंमें 'पञ्चजन' शब्दकी प्रामाणिक कई व्याख्याएँ मिलती हैं, इस कारण 'पञ्चजन' शब्दकी व्याख्याको ही प्रस्तुत करते हैं—"तत्र पञ्चजनाः" ॥ १ ॥ [ निघ० ] आयती (१) । व्यथाना (२) । अभीशू (३) । अप्रवाना (४) । विनङ्क॒ सौ (५) । गभस्ती (६) । करस्नौ (७) । बाहू (८) । भुरिजौ (८) । क्षिपस्ती (१०) । शक्वरी (११) । मरिचे (१२) । इति द्वादश बाहु नामानि ॥ ४ ॥ [ निघ० ] अग्रुवः (१) । अराव्यः (२) । विशः (३) । क्षिपः (४) । मर्याः (५) । रशनाः (६) । धीतयः (७) । अथर्यः (८) । विपः (६) । कक्ष्याः (१०) । अवनयः (११) ।