निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । ६७
सत्यनामानि उत्तराणि षट् । ‘सत्यं’ कस्मात् ?
सत्सु तायते । सत्प्रभवं भवति इति वा ।
अष्टौ उत्तराणि पदानि । पश्यति-कर्माणः
उत्तरे धातवः । धायति-प्रभृतीनि च नामानि
आमिम्राणि ।
नव उत्तराणि पदानि सर्वपदसमाम्नानाय ।
अथात उपमाः । ‘यदतत्तत्सदृशम्’ इति
गार्ग्यः तदासाम् कर्म । ज्यायसा वा गुणेन प्रख्यात
तमेन वा कनीयांसं वा अप्रख्यातं वा उपमिमीते ।
अथापि कनीयसा ज्यायांसम् ।
अर्थ ।
निरुक्तार्थ—ईश्वर नामोंके अनन्तर बारह (१२) बहु (बहुत)
के नाम हैं। ‘बहु’ किस अर्थसे है ? ‘प्रभवति’ अर्थात् समर्थ होता
है, इस कर्तृवाच्य (प्र० उप० भू० धा०) से। अनन्तर ‘ह्रस्व’ के
ग्यारह (११) नाम हैं। ‘ह्रस्व’ अल्पोभाव अर्थमें ‘ह्रस्व’ (भ्वा०
प०) धातुसे है। [क्योंकि—वह महत्को अपेक्षा छोटा हुआ
प्रतीत होता है।]
‘महत्’ के नाम पच्चीस हैं। ‘महान्’ क्यों है ? मान या परि-
माणसे अन्योंको छोडता है। यह शाकपूणि आचार्य मानते हैं।
अथवा महनीय या पूजनीय होता है। उन महत् नामोंमें ‘ववक्षिथ’
‘विवक्षसे’ ये दोनों दोहराये हुए ‘वच्’ (अ० प०) धातुसे अथवा
वह (भ्वा० उ०) धातुसे हैं।