निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८ ३ अ० ३ पा० १ ख० । अनन्तर बाईस ( २२ ) गृह "( घर ) के नाम हैं. 'गृह' क्यों हैं ? ग्रहण करते हैं । ( धान्य आदिको ) इस प्रकार कर्तृवाच्य 'ग्रह' उपादाने ( क्र्या० उ० ) धातुसे हैं । अनन्तर दश ( १० ) परिचरण अर्थमें धातु हैं । अनन्तर बीस ( २० ) सुखके नाम हैं। 'सुख' क्यों ? 'ख' नाम इन्द्रियोंके लिये सुहित होता है। फिर 'ख' शब्द 'खन' खनने ( भ्वा० उ० ) धातुमे है। [ क्योंकि कर्ण आदि इन्द्रियोंके स्थान खोदे हुए जैसे होते हैं । ] अनन्तर सोलह ( १६ ) रूपके नाम हैं। 'रूप' शब्द दीप्ति अर्थवाले ( भ्वा० आ० ) 'रुच' धातुसे है। [ क्योंकि वह दीप्त होता है । अनन्तर दश ( १० ) प्रशस्य ( प्रशंसा योग्य ) के हैं । अनन्तर ग्यारह ( ११ ) प्रज्ञाके नाम हैं । अनन्तर छः ( ६ ) सत्यके नाम हैं । 'सत्य' क्यों ? सत्पुरुषोंमें ही फैलता है। [ क्योंकि-सत्पुरुषोंके समीप मिथ्या नहीं बोला जा सकता । ] अथवा सत्पुरुषोंसे ही उत्पन्न होता है । [ क्योंकि- सत्पुरुष ही सत्य बोलते हैं । ] अनन्तर आठ (८) उत्तरे पद हैं । अनन्तर आठ (८) नेत्रसे देखने अर्थ वाले धातु हैं । और चायति' आदि नाम हैं । अतः ये आमिश्र ( मिले हुए ) हैं । अनन्तर नव ( ६ ) उत्तर पद हैं सब ( नाम आख्यात, उपसर्ग और निपात ) चारों प्रकारके पदोंके समाम्नानके अथ हैं । [ अर्थात् इन्हीं नव ( ६ ) पदोंके आम्नान करनेमें सब निपात और उपसर्ग दिखाये गये समझे जावेंगे। चारोंमें इन्हींके दिखानेकी त्रुटि थी सो सब पूरी की जाती है । ]