निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्द निरुक्त । ६६ अनन्तर उपमा हैं। [लक्षण] जो उस (उपमेय) से मिश्र और उसके समान हो सो उपमा होती है—यह गार्ग्य आचार्य मानते हैं। सो इन उपमाओंका कर्म या अर्थ है। क्या ? जो- अथवा उत्कृष्ट-गुणसे अल्पगुण या छोटेको अथवा अधिक प्रसिद्धसे अप्रसिद्धका उपमा करता है। और छोटे या निकृष्टसे बड़े या श्रेष्ठको (उपमा करता है।) ॥ १ ॥ व्याख्या ! इस खण्डमें निघण्टु के तेरह (१३) खण्डोंकी व्याख्या है। जिनमें बहु (१) ह्रस्व (२) महत् (३) गृह (४) परिचरण (५) सुख (६) रूप (७) प्रशस्य (८) प्रज्ञा (९) सत्य (१०) पश्यति (११) सर्वपद (१२) उपमा (१३) इन अर्थोंके वाचक शब्द हैं। इनका संगतियां भी योग्यतानुसार कल्पित कर लेना चाहिये। जैसे कि-- ईश्वर ही बहु होते हैं। बहु सम्बन्धसे ह्रस्व, ह्रस्व सम्बन्धसे महत्, जो महत् होते हैं वे ही गृही (गृहस्थ) होते हैं, गृहोंमें ही परिचर्या (सेवा) होती है परिचर्यासे ही सुख होता है, सुखी ही रूपवाले होते हैं रूपवाले ही प्रशंसनीय होते हैं, जो प्रज्ञा (बुद्धि) वाले होते हैं वे ही प्रशंसनीय होते हैं जो प्रज्ञावान् होते हैं, वे ही सत्य बोलते हैं, जो सत्य बोलते हैं, वे ही देखते हैं—इत्यादि । चिक्यत् आदि। इस खण्डके भगवद्दुर्गाचार्यने तीन व्याख्यान दिखाये हैं, जो भिन्न भिन्न पूर्वाचार्योंके हैं और यास्काचार्यके अनुमत हैं। १—चिक्यत् आदि दर्शनार्थक धातु हैं, और वे ही चायत आदि रूपमें नाम हैं। इसलिये ये मिलित या संसर्गी हैं। कहाँ धातु