निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७० ३ अ० २ पा० १ ख० । और कहाँ पर नाम इस प्रकारका ज्ञान प्रकरण और समीपस्थ पदसे होगा। २—उनमें कोई नाम और कोई आख्यात हैं। ३—विचक्षण् ( १ ) विचर्षणः ( २ ) विश्वचर्षणः ( ३ ) ये तीन नाम हैं और ८ जो शेष हैं वे सब धातु हैं। और वे पूर्वाचार्यों के प्रामाण्यवश मिलित पढ़े जाते हैं। उपमा—जिस प्रकार अन्य पृथिवी आदि पदार्थोंके नाम केवल अपने स्वरूपसे ही निघण्टुमें पढ़े गये हैं और उनके उदाहरण वेदमें ढूंढ़ लिये जाते हैं उसी प्रकार उपमा शब्दोंको वहाँ ही पढ़ा है, किन्तु उनके उदाहरण ही आम्नात किये हैं जिनमें उपमा वाचक शब्द और वे जिस प्रकारसे जिसकी उपमा जिसमें कह रहे हैं वह सब हैं। जैसे "इदमिव" इसके समान। यहां 'इव' उपमा वाचक और 'इदम्' उपमेयवाचक पद हैं। उपमा दो पदार्थों के बीचका एक सम्बन्ध है इसीसे वह दूसरेके साथमें हो आता है, किन्तु कहीं एक पदार्थ अपना आप ही उपमान हो जाता है, जैसे "वायोरात्मोपमा गतिः" अर्थात् वायुकी गति या वेग अपनी ही उपमा रखता है। अधिकसे अल्पकी उपमा। "सिंहो माणवकः"माणवक। सिंह है। यहाँ सिंहके अधिक शूरत्वसे माणवक (बालकके) के शौर्यको उपमा है। अधिक प्रसिद्धसे अप्रसिद्धकी उपमा। "चन्द्र इव कान्तो माणवकः" चन्द्रमाके समान सुन्दर माणवक है यहाँ प्रसिद्ध चन्द्रसे अप्रसिद्ध माणवककी उपमा है। कहीं छोटे या अल्पगुणसे बड़े या अधिक गुणकी उपमा। किन्तु यह वेदमें ही मिलती है, लोकमें इसका अधिक उपयोग नहीं है ॥ १ ॥