निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । ७१ (खण्ड २) [ निरु० ] “तनूत्यजेव तस्करा वनर्गू रशनाभि दशभिरभ्यधीताम् ।” [ ऋ० सं० ७, ५, ६२, ६ ] 'तनूत्यक्' तनूत्यक्ता 'वनर्गू' वनगामिनौ चाग्नि- मन्थनौ बाहू तस्कराभ्यामुपमिमीते । 'तस्करः' तत् करोति, यत् पापकम्–इति नैरूक्ताः । तनोतेर्वा स्यात् । सन्ततकर्मा भवति । अहोरात्रकर्मा वा । “रशनाभिर्दशभिरभ्यधीताम्” अभ्यधाताम् । ज्यायां स्तव गुणोऽभिप्रेतः ॥ २ ॥ अर्थ । “तनूत्यजेव” मन्त्रका त्रित ऋषि । त्रिष्टुप् छन्दः । प्रातर- नुवाक और आश्विनमें शस्त्र । वनमें रहनेवाले, मार्गमें लूटनेवाले दो चोर 'हरेंगे, या भागेगें' ऐसे अभिप्रायसे चले, उन्हींसे दो बाहुओं (भुजों) को उपमा इस मन्त्रमे है । मन्त्रार्थ—हे अग्निदेव ! शरीरको त्यागनेवाले, वनमें विचरने वाले दो चोरोंके समान हमारे दो बाहू दश अङ्गुलियोंसे दोनों अरणियोंके द्वारा तुम्हें बाँध लें । यहाँ श्रेष्ठ भुजोंकी निकृष्ट तस्करोंसे उपमा है । नि० अ०—'तनूत्यज्' नाम तनू (शरीर) का त्यागने वाला । 'वनर्गू' वनगामी या वनमें रहने वाले । अग्निके मथने वाले बाहु- ओंको दो तस्करों (चोरों) से उपमा करता है । 'तस्कर' क्यों ? 'वह कर्म करता है जो पाप रूप है'—यह नैरुक्त आचार्य मानते हैं ।