निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२ ३ अ० ३ पा० २ खं० । अथवा सन्तत ( निरन्तर ) कर्मवाला होता है। अथवा रात्रि दिन कर्म करता है [दिनमे वनमे चोरी करता है और रात्रिमे ग्राममे ।] दश रशनाओं ( अङ्गुलियों ) से 'अभ्यधीताम्' बाँध लें ॥ २ ॥ व्याख्या "तनूत्यजेव" मन्त्र 'अथापि कनीयसा ज्यायांसम्' छोटेसे भी बड़ेको उपमा दी जाती है, इस पूर्व खण्डके वाक्यके अनुसार निकृष्ट पदार्थ से उत्तम पदार्थकी उपमामें उदाहरण है। तस्करके दो विशेषण मन्त्रमें हैं--"तनूत्यज्या" देहत्यागी "वनेर्गू" वनचारी। ये दोनों ही विशेषण यह बता रहे हैं कि ग्राम-वासी और अपने प्राणोंको बचानेकी इच्छा रखने वाला चोर असली चोर नहीं है। इससे बाँधने और पकड़नेकी उपमाको पुष्ट करनेके लिये मन्त्रमें तस्करके ये दो विशेषण भी दिये हैं॥ २॥ ( खण्ड ३) [निरु०-] "कुहस्विद् दोषा कुहवस्तोरश्विना कुहा- भिपित्वं करतः कुहोषतुः । को वां शयुत्रा विधवेव देवरं मर्यं न योषा कृणुते सधस्थ- आ ॥” [ ऋ० सं० ७, ८, १, ८२ ] कस्विद् रात्रौ भवथः, क्व दिवा, क्वाभिप्राप्तिं कुरुथः, क्व वसथः, को वां शयने विधवेव देवरम् । [एकपदनि०-] (देवरः कस्माद् ? द्वितीयो वर उच्यते ) 'विधवा' विधातृका भवति । विधवनाद् वा । विधावनाद् वा इति चमशिराः । अपि वा