निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७४ ३ अ० ३ पा० ३ ख० । मन्त्रार्थ-हे अश्विनौ ! तुम दोनों रात्रिमें कहाँ रहते हो ? तुम दोनों दिनमें कहाँ रहते हो ? कहाँ तुम दोनों स्नान भोजन आदिके अर्थ अपनी उपस्थिति करते हो ? कहाँ वसते हो ? विधवा शयनमें देवरको जैसे ( या ) ( कोई ) स्त्री ( किस्सो ) पुरुषको जैसे, कौन तुम्हें अपने पासमे करता है ? [ जिससे कि-तुम न रात्रि और न दिन होमें हमारे देखनेमें आते । ] दुःख ! [ इस ऋचामें नीच देवरसे उत्कृष्ट ( बड़े ) अश्विनोंकी उपमा है । ] नि० अ०-कहाँ रात्रिमें होते हो ? कहाँ दिनमें ? कहाँ आना जाना करते हो ? कहाँ वसते हो ? कौन तुम दोनोंको शयनमें विधवा देवरको जैसे ॥ [ एक पद नि०-] [ देवर क्यों ? द्वितीय (दूसरा) वर कहाता है ] 'विधवा' क्यों ? विधातृका है या उसका धाता ( वर ) मर गया । अथवा भर्त्ताके मर जानेसे वह कम्पित जैसी हो जाती है। अथवा 'पतिके अभावसे उसे कोई रुकावट नहीं रहती और वह जहाँ तहाँ धावन करतो है, इसीसे विधवा है ।"-यह चर्मशिराः ( चमड़ेका टोप पहनने वाले ) आचार्य मानते हैं । अथवा 'धव' यह मनुष्यका नाम है, उसके वियोगसे यह विधवा है। 'देवर' क्यों ? क्रीड़ा करता है। 'मर्य' नाम मनुष्य । ( क्योंकि-) वह मरण धर्मवाला है। 'योषा' 'यु' मिश्रणे ( अदा० प० ) धातुसे है। [ क्योंकि-) वह अपनेको पुरुषके साथ मिला लेती है ! ] [ अर्थ पाद-] समान स्थानमें बुला लेता है, या करता है । यहाँसे निपात हैं, सो [ सामान्यरूपसे-] पहले ही व्याख्यान किये जा चुके हैं। [ अब विशेषरूपसे कहे जाते हैं-] 'यथा' यह कर्म या क्रियाकी उपमामें है। जैसे- "जिस प्रकार वायु कम्पित होता है, जिस प्रकार वन, तथा जिस प्रकार समुद्र कम्पित होता है। [ वैसे ही हे दश मासमें