निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । ७५ होने वाले गर्भ ! तू अपनी इस माताको दुःख न देता हुआ जरायु ( जेर ) के साथ बाहर निकल । ]" [ यहाँ 'यथा' पदसे वायु, वन और समुद्रकी कम्पन क्रियासे गर्भकी क्रियाको उपमा दी गई है । ] अन्य उदाहरण-- 'भ्राजन्तो अग्नयो यथा" अर्थात् ' [ भगवान् सूर्यके किरण ] अग्नियोंके समान प्रदीप्त होते हुए [ अन्धकारको दूर करने या अन्य उपकारोंके करने या ओषधियोंके पाक आदि करनेके लिये मनुष्योंके प्रति जाते हैं । ]" [ यहाँ 'यथा' पदसे अग्निकी प्रदीपन क्रियाका सादृश्य किरणों के प्रदीपनमे बताया गया है । ] अन्य उदाहरण-- “आत्मा यक्ष्मस्य नश्यति पुरा जीवगृभो यथा ।” अर्थात् [ मैं आथर्वण भिषक् (वैद्य) जिस समय इन ओषधियोंको प्रशंसा करता हुआ हाथमें धारण करता हूँ, और हस्तमे लेकर रोगोंके पास पहुचता ही हूं कि उस समय ओषधियोंके प्रयोगसे ] पहले ही यक्ष्म रोगका आत्मा नष्ट हो जाता है जिस प्रकार 'जीवगृभ्' (जीवका लेने हारा) या यमदूतके प्रहारसे पहले ही अहत या बिना मारे प्राणियोंका जीव नष्ट हो जाता है । [ एक पद नि० ] 'आत्मा' क्यों ? 'अत, सातत्यगमने (भ्वा० प०) धातुसे है । [ अर्थात् सब स्थानोंमे गया हुआ रहता है । ] अथवा व्याप्ति अर्थमें 'आप्' (स्वा० प०) धातुसे है । क्योंकि- सभी वस्तु मात्र उससे व्याप्त रहता है, जिससे कि वह सर्वगत है । अथवा वह कार्य और कारणमें स्थित हुआ संघात (देह) मे आत्त (पाया हुआ) जैसा होता है, जितनेसे कि-वह व्यापन किया हुआ है । या सर्वव्यापक होने पर भी जितने शरीरसे व्यापन किया हुआ होता है उतना ही प्रतीत होता है । क्योंकि