भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 383

७६ ३ अ० २ पा० ३ खं० । उतने ही प्रदेशमें उसकी चैतन्यशक्ति प्रकट होतो है। जिस प्रकार तप्त लोहे पर तृणको मुट्ठी छोड़ने पर 'तृण संयोग स्थलमें ही अग्नि प्रकट होता है और अन्य तप्त लोह भागमें अग्नि रहता हुआ भी प्रत्यक्ष नहीं होता। [नैरुक्तोंके मतमें भी आत्मा विभु है।] “अग्निर्न ये भ्राजसा रुक्मवक्षसः” अर्थात् “अग्निके समान जा मरुद् देव भ्राजमान (प्रकाशमान) सुवर्णयुक्त छातोवाले या चम- कीलो छातो वाले हैं।”॥ ३॥ व्याख्या। “कुहस्वित् दोषा” मन्त्र जो उपमाके उदाहरणमें दिया गया है, कक्षोवानको पुत्री घोषा और अश्विनीकुमारोंके संवादसे हिन्दुओंके घरकी पतिव्रता स्त्री और व्यभिचारकी शङ्कासे युक्त पतिके संयोगमें स्त्रीका उस पतिके प्रति कैसा भाव हो जाता है तथा हिन्दू पुरुषोंमें वह कैसा घृणास्पद अथवा त्याज्य हो जाता है इसका एक उत्तम चित्र दिखाता है। हिन्दू स्त्री और पुरुषका सहनिवास ही नियत है, पुरुषको चाहिये कि वह दिनमें बाह्य- कृत्योंको करके रात्रिके समय अपने घरमें आवे। जब वह ऐसा नहीं करता है तो स्त्रीको उस पर परस्त्री समागकी शङ्का हो जाती है। इसी नियमके अनुसार घोषाको अश्विनों पर शङ्का हुई है, उसने अश्विनोंसे कहा है कि जिस प्रकार विधवागामी देवर या कोई पुरुष परस्त्रीगामी किसी सज्जनके पास नहीं बैठ सकता उसी प्रकार तुम भी हो। जैसा कि कहा है कि—“कः वां सधस्थे आकृणुते” कौन पुरुष तुम्हें पास बुला सकता है या बुलाता है” अर्थात् कोई नहीं, प्रयोजन यह कि—तुम असदाचारके कारण किसी पुरुषके पास बैठने योग्य नहीं हो। जैसे कि—और और व्यभिचारी।