निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । ७७ “कः” पुल्लिङ्ग निर्देशका प्रयोजन यह है कि दूसरी स्त्रियोंने तो उसे अपने पास बैठा कर व्यभिचारो बनाया हो है, तब पुरुष ही उसका त्याग कर सकते हैं । भाष्यकारने भी “कनीयसा ज्यायांसम्” के उदाहरणमें इस मन्त्रको देकर यही प्रयोजन लिया है कि व्यभिचारा या विधवा- गामी देवर त्याज्य है । “यथा वातो यथा वनं यथा समुद्र एजति । एवा त्वं दशमास्य सहावेहि जरायुणा ।” इस मन्त्रका सप्तवध्रि आत्रेय ऋषि। अनुष्टुप् छन्दः। गर्भका अनुमन्त्रण कर्म। जिस समय गर्भवती स्त्रीको दशवें मासमे प्रसव शूल हो इस मन्त्रसे पिता गर्भको अभिमन्त्रित करता है, जिससे सुखपूर्वक प्रसव हो जाता है। “यदि मा वाजिन्नङ्गमोषधो र्हस्तमादधे । आत्मा यक्ष्मस्य नश्यति पुरा जोवगृभो यथा ।” ओषधिसूक्तमें ऋचा है। आथर्वण भिषक् ऋषि। अनुष्टुप् छन्दः। इस मन्त्रसे दीक्षा किया हुआ यजमान आदि अग्निसे उपतप्त (जला हुआ या दाझा हुआ) इक्कोस बार कुशजलसे मार्जन किया जाता है। मन्त्रसामर्थ्यसे रोगीका मार्जन विशेष करके यक्ष्म रोगीका मार्जन करनेसे उसका हित होता है। “अग्निर्नये” मन्त्र उपमार्थक “न” निपातका उदाहरण है। इस मन्त्रमें उपमार्थके लिये ‘न’ निपात चार बार आया है।— 'अग्निर्न' अग्निके समान (१) 'वातासो न' वायुयोंके समान (२) 'प्रज्ञातारः सुनोतयोन' बड़े समझदासों व शुभ नीतिवालोंके समान (३) 'सुशर्माणोन' सुखकारो बन्धुओंके समान (४) मरुद् देवता हैं। पहले भाष्यकारने निरुक्तके प्रथमाध्यायके द्वितीय पादमें