निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७८ ३ अ० ३ पा० ४ ख० । निपातोंकी व्याख्या की है और वहां पर “न” निपातका उपमा अर्थमें “दुर्मदासो न सुरायाम्” मदिराके पानसे दुष्ट मदवालोंके समान, यह उदाहरण भी दिया है, इससे यहाँ पर उसी निपातका उक्त उदाहरण फिर देना न चाहिये था ? इस पर भगवद्दुर्गेन दो मत दिखाये हैं:— (क) कोई आचार्य इस खण्डमे “अग्निर्नये” इस उदाहरणको नहीं पढ़ते । (ख) कोई आचार्य मानते है कि-पहले भाष्यकारने निपातोकी व्याख्या भूमिकाके अवसरमें की है, और इस समय निघण्टुशास्त्रके क्रमानुसार की है इसलिये यह उदाहरण यहाँ पर उचित है ॥ ३ ॥ ( खण्ड ४ ) [निरु०-] “चतुरश्चिद् ददमानात् विभीयादानिधातोः। न दुरुक्ताय स्पृहयेत् ।” [ऋ० सं० १, ३, २३, ४] चतुरोऽक्षान् धारयत इति तद् यथा कितवाद् बिभीयात्, एव मेव दुरुक्ताद् बिभीयात्, न दुरुक्ताय स्पृहयेत् कदाचित् । ‘आ’ इत्याकार उपसर्गः । पुरस्तादेव व्याख्यातः । अथापि उपमार्थे दृश्यते ।— “जार आभगम्” [ ऋ० सं० ७, ६, १०, १] जार इव भगम् । आदित्योऽत्र जार उच्यते । रात्रेर्जरयिता स एव भासाम् । तथापि निगमो भवति ।— “स्वसु जारः शृणोतु नः” [ऋ० सं० ४, ८, २१, ५]