निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८० ३ अ० ३ पा० ४ खं० । 'चित्' निपातका उदाहरण — मन्त्रार्थ—जिस प्रकार चार अक्षों (पासों) को धारण किये हुए जुवारियेसे उसके पासोंको फेंकनेसे पहले, दूसरा कितव (जुवारिया) जो उसके साथ जुआ कर रहा है, डरता है, [ क्या मेरी इच्छानुसार पासे गिरेंगे या विपरीत, जिससे कि मुझ यह जीत लेगा ? ] उसी प्रकार दुरुक्त (गाली) से डरना चाहिये, तथा दुरुक्तकी कभी भी इच्छा न करे । नि० अ०—चार अक्षोंको धारण करनेवाले कितवसे जिस प्रकार डरे, ऐसे ही दुरुक्त (दुर्वचन) से डरे, किन्तु कदाचित् दुरुक्त (गाली) खानेकी इच्छा न करे । 'आ' यह आकार उप- सर्ग (रूपसे) पहले ही (अ० १ पा० १ खं० ५ में) व्याख्यान किया जा चुका है। अब उपमा अर्थमें (निपातके रूपसे) देखा जाता है। [जैसे-] “जार आ भगम्” [ ऋ० सं० ७,६,१०,१ ] 'जार भग (रस) को जैसे।' यहाँ 'जार' आदित्य (सूर्य) कहा गया है। [क्योंकि] वह रात्रिका जरण (नाश) करने वाला है। वही भासों (ज्योतियों) का। वैसा भी निगम (जनानेवाला) मन्त्र है। 'स्वसुर्जारः शृणोतु नः' [ऋ० सं० ४, ८, २१, ५] स्वसा (भगिनी) का जार हमारी सुनाई करे। उषाको ही इसकी बहिन कहता है [किस कारण] साथ रहनेसे या रस (जलके) हरनेसे। इसके अतिरिक्त [मन्त्र] में यह मनुष्य जार ही माना जा सकता है। [ऐसा होनेसे भग शब्दसे] स्त्री भग (योनि) हो सकता है। 'भज' (भ्वा० उ०) धातुसे। 'मेषो भूत:' मेष (मोढे) के समान' यह 'भूत' शब्दसे उपमा अर्थ है। [जैसे] “मेषो भूतो ३ भियन्नयः” [ऋ० सं० ५, ७, २५, ५]