भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 388

हिन्दी निरुक्त । ८१ हे इन्द्र ! जो तू मेंढेके समान मेधातिथिके यज्ञमें आया, 'मेष' 'मिष' ( तु० प० ) धातुसे है। वैसे ही 'पशु' पश्यति या 'दृश' ( भ्वा० पा० ) धातुसे है । अग्निको रूप शब्दसे उपमा। जैसे— “हिरण्य रूपः०” इत्यादि 'हिरण्य (सुवर्ण) के रूपके समान रूप वाला, वह हिरण्य जैसा दिखाई देनेवाला हिरण्य जैसा अपांनपात् जलोंका पोता, वैद्युत, अग्नि।' हिरण्य (सुवर्ण) वर्णका जैसा इसका रूप है। और 'था' यह उपमार्थक है। [ जैसे— “तं प्रत्नथा० [ ऋ० सं० ४, २, २३, १ ] 'हे सोम ! तू 'तम्' उस इन्द्रको अपने वीर्यसे तृप्त करके ( प्रत्नथा ) चिरन्तन भृगु आदि महर्षियोंके समान (पूर्वथा) ऋषि पुत्रोंके समान (विश्वथा) सब प्राणियोंके समान ( इमथा ) इस समयके यजमानोंके समान [ हमारे कामोंको दोहन करता है।] [ प्रसङ्गसे ] 'अयम्' (इदम्) जो बहुत ही समीप हो, दूरस्थकी अपेक्षा। “असौ” (अदस्) जो निकटसे दूर गिरा हुआ जैसा हो । 'अमुथा' की व्याख्या “असौ” के समान है। 'वत्' यह लोकमें प्रसिद्ध उपमावाचक है। [कैसे] 'ब्राह्मणवत्' ब्राह्मणोंके समान। 'वृषलवत्' वृषलों (शूद्रों) के समान। 'वृषल' क्यों ? वह 'वृष (बैल) कासा शीलवाला होता है। अथवा वृष (धर्म) में अशील (अधर्म स्वभाव) वृषल होता है ॥४॥(१६) व्याख्या । अपांनपात् । रूपोपमाके उदाहरण “हिरण्यरूपः...अपांनपात्” मन्त्रमें 'अपांनपात्' देवताकी स्तुति है। अप् नाम जलका और 'नपात्' या नप्ता, पोते (नाती) का नाम है, दोनोंके मेलसे