भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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हिन्दी निरुक्त । ८३

'भरद्वाजः' । 'विरूपो' नानारूपः । 'महिव्रतो' महाव्रतः-इति ॥ ५ ॥ (१७) इति तृतीयाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ ३, ३ ॥ अर्थ । “प्रियमेधवत्” मन्त्रका प्रस्कण्व ऋषि । अग्निदेवता । अनुष्टुप् छन्दः । प्रातरनुवाक और आश्विनमें शस्त्र । 'वत्' का मन्त्र उदाहरण— हे जातवेदस् ! सर्वज्ञ महिव्रत ! बड़े व्रतवाले ! या कर्म वाले ! अग्नि ! प्रियमेधके समान, अत्रिके समान, विरूपके समान, और अङ्गिराके समान मुझ प्रस्कण्वका 'भी' आह्वान सुन । [ यह आशीः या प्रार्थना है ।] नि० अ०—'प्रियमेध' क्यों ? इसकी प्रियमेधा (बुद्धि) है । जिस प्रकार इन ऋषियोंका, इसी प्रकार प्रस्कण्वका बुलावा सुन । [एक पद निरुक्त-] 'प्रस्कण्व' क्या ? कण्वका पुत्र । अथवा कण्व-प्रभव ( कण्वसे उत्पन्न हुआ ) जैसे प्रगत अगका प्राप्त । अर्चिष् या ज्वालाओंमें भृगु उत्पन्न हुआ । 'भृगु' क्यों ? भृज्यमान भुंजता हुआ [होनेसे,] देहमें नहीं । [प्रयोजन—भृगु देहसे उत्पन्न नहीं हुए, ये दिव्य सृष्टि हैं ।] अङ्गारोंमें ( अङ्गिरस् ) ऋषि हुऐ । 'अङ्गार' क्यों ? अङ्कन हैं. [क्योंकि जहाँ गिरते हैं वहाँ अङ्क (चिन्ह) कर देते हैं ।] 'इसीमें तृतीय (तीसरे) को पाओ' यह बोले-इसीसे 'अत्रि' है ।] अत्र एव...ऋच्छत इस वाक्यके अक्षरोंसे चुनकर 'अत्रि' शब्द बना ।] अथवा 'न त्रि' 'तीन नहीं' इन दो शब्दोंसे।'अत्रि' शब्द बना है । विशेष खनन ( खोदने ) से 'वैखानस' है । भरण ( पालन ) से 'भरद्वाज' है । नानारूप होनेसे 'विरूप' है । महाव्रत या बड़े कर्मवाला होनेसे 'महिव्रत' है । इति ॥ ५ ॥ ( १७ ) इति तृतीयाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ ३, ३ ॥