निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८४ ३ अ० ३ पा० ५ खं० । व्याख्या । भृगु, अङ्गिरा, अत्रि और वैखानस ऋषियोंकी उत्पत्ति जो निरुक्त शास्त्रके आचार्यों को अभिमत है।— ऐसा इतिहास है, कि सृष्टिके आरम्भकालमें प्रजापतिने अपना वीर्य लेकर अग्निमें होम कर दिया, उससे ज्वाला (झल) में 'भृगु' नाम महर्षि उत्पन्न हुआ । फिर ज्वालाके हट जानेसे अङ्गारोंमें उसी वीर्यके एक अंशसे 'अङ्गिरस्' नाम महर्षि हुआ । फिर पहले उत्पन्न हुए महर्षि बोले कि-इसी स्थानमें तृतीय (तीसरे) को पाओगे, इस बचनके अनन्तर पाये हुए ऋषिका पूर्व ऋषियोंके वाक्यके अक्षरोंसे ही 'अत्रि' नाम हुआ । अथवा 'अत्रि' नाममें जो 'अ'-कार है, यह निषेध अर्थको देता है, कि 'तीन ही नहीं' किन्तु खोदो इसी स्थानमें चौथा और है, इस अर्थके अनुसार तीसरे महर्षिका नाम 'अत्रि' है। और अग्नि हटाकर उसी स्थानको खोदनेसे जो महर्षि निकला उसका नाम वैखानस है। इस प्रकार “प्रियमेधवत्” मन्त्रोक्त तथा अन्य कुल चार ऋषियोंकी उत्पत्ति और नामका इतिहास है। यद्यपि उदाहरण मन्त्रमें 'भृगु' और 'वैखानस' नहीं हैं अतः उनका निर्वचन यास्कको नहीं करना चाहिये था, किन्तु मन्त्रोक्त 'अत्रि' 'अङ्गिरस्' नामोंका इतिहास इनके साथ है, इसीसे मन्त्रके पाठके क्रमको छोड़कर भृगु और अङ्गिरस् आदि क्रमसे निर्वचन किया। क्योंकि इस आनुपूर्वीके बिना इनका निर्वचन नहीं हो सकता था, तथा अन्यत्र भी प्रयोजनके अनुसार ऐसे निर्वचनका अनुसन्धान रखना चाहिये। यह दिखानेके अर्थ ऐसा किया ॥४॥