भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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तृतीय पादकी उपमाका चित्र ।

उपमा वाचक पदउदाहरणअर्थअ०पा०खं०
(१) इव ।“तनूत्यजेव”...(ऋक्) देहत्यागी जैसे
“विधवेव”...(ऋक्) विधवा जैसे
(२) न ।“मर्यं न”...(ऋक्) मनुष्यको जैसे ।
“अग्नि र्न”...(ऋक्) अग्निके समान ।
(३) यथा ।“यथावातः”...(ऋक्) पवन जैसे ।
“अग्नयो यथा”...(ऋक्) अग्नियों जैसे ।
“जीवगृभो यथा”...(ऋक्) जीवको लेनेवालेके जैसे ।
(४) चित् ।“चतुरश्चिद्ददमानात्”(ऋक्) चार अक्षोंके लेनेवालेसे जैसे ।
(५) आ ।“आ भगम्”...(ऋक्) भग (रस या योनि) जैसे ।
(६) भूतः ।“मेषो भूतः”...(ऋक्) मेढा जैसा ।
(७) रूपम् ।“हिरण्यरूपः”...(ऋक्) सुवर्ण जैसा ।
(८) था ।“प्रत्नथा”...(ऋक्) चिरन्तनोंको जैसे ।
(६) वत् ।“ब्राह्मणवत्”...(ऋक्) ब्राह्मण जैसे ।
“प्रियमेधवत्”...(ऋक्) प्रियमेधके जैसे ।
इति तृतीयः पादः ॥ ३ ॥ ३ ॥