भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 400

हिन्दी निरुक्त । ३३ निर्णीतान्तर्हित नामधेयानि उत्तराणि षट् । ( निर्णीतं कस्मात् ? निश्चितं भवति । ) दूरनामानि उत्तराणि पञ्च । 'दूरं' कस्मात् ? द्रुतं भवति । दुरयं भवति । पुराणनामानि उत्तराणि षट् । 'पुराणं' कस्मात् ? पुरातनं भवति । नवनामानि उत्तराणि षडेव । 'नवं' कस्मात् ? आनीतं भवति ॥ २ ॥ ( १८ ) अर्थ । [ निरु० ] आगे पूजा में चवालीस ( ४४ ) धातु हैं । आगे मेधावी ( धारणावाली बुद्धिवाले ) के चौबीस ( २४ ) नाम हैं । 'मेधावी' क्यों है ? मेधासे मेधावान् होता है । 'मेधा' ( क्या ? ) मति ( बुद्धि ) में पुरुषकी एक शक्ति प्रकट होती है वह मेधा है । आगे स्तोतृ ( स्तुति करने वाले ) के तेरह नाम ( १३ ) नाम हैं । आगे यज्ञके पन्द्रह ( १५ ) नाम हैं । 'यज्ञ' क्यों है ? “ 'यज्' ( भ्वा० उ० ) धातुका अर्थ ( यज्ञ ) लोकमें प्रसिद्ध है ।” यह निरुक्त शास्त्रके आचार्य मानते हैं । अथवा इसमें याचना होती है इससे ( यज्ञ ) है । अथवा यजुर्वेद ( मन्त्रों ) से गीला जैसा होता है । [ क्योंकि-वेही उसमें बहुत होते हैं । ] “उसमें बहुत काले अजिन ( मृगचर्म ) होते हैं । इससे 'यज्ञ' है” यह